चंडीगढ़ 06 Feb | पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी द्वारा आवेदन के दौरान पूर्व में दर्ज एफआईआर की जानकारी न देना, अपने-आप में उसे नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता—खासकर तब, जब वह आपराधिक मामले में पहले ही सम्मानपूर्वक बरी हो चुका हो।न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थितियों में भर्ती करने वाले विभागों को यांत्रिक ढंग से निर्णय लेने के बजाय मामले की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता और अंतिम परिणाम को ध्यान में रखकर विवेकपूर्ण फैसला लेना चाहिए।
दो याचिकाओं पर एकसाथ फैसला
जस्टिस जगमोहन बंसल की एकल पीठ ने इस विषय से जुड़ी दो याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पंजाब पुलिस को निर्देश दिया कि संबंधित अभ्यर्थियों को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी किए जाएं।
पूर्व सैनिक का मामला बना मिसाल
मामले में एक याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक था, जिसने भारतीय सेना में 17 वर्षों तक सेवा देने के बाद पंजाब पुलिस में पूर्व सैनिक (अनुसूचित जाति) कोटे के तहत भर्ती के लिए आवेदन किया था।भर्ती प्रक्रिया के सभी चरणों में सफल रहने के बावजूद, पुलिस सत्यापन के दौरान उसके खिलाफ पूर्व में दर्ज एक आपराधिक मामले का हवाला देकर उसकी उम्मीदवारी रद कर दी गई।यह मामला उसकी पत्नी द्वारा वैवाहिक विवाद के दौरान आईपीसी की धाराओं 498ए, 406, 506 और 34 के तहत दर्ज कराया गया था।
ट्रायल कोर्ट से हो चुका था बरी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए पाया कि यह आपराधिक मामला आवेदन से कई वर्ष पहले ही समाप्त हो चुका था और ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के आरोप सिद्ध न होने के आधार पर याचिकाकर्ता को स्पष्ट रूप से बरी कर दिया था।अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता के पिता ने खुद अदालत में स्वीकार किया था कि दहेज की कोई मांग नहीं की गई थी और विवाद पारिवारिक मतभेदों तक सीमित था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह और पवन कुमार मामलों में दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि सूचना छिपाने के हर मामले में स्वतः अयोग्यता लागू नहीं होती।नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों का संतुलित मूल्यांकन करे और निर्णय लेते समय परिस्थितियों को नजरअंदाज न करे।
पुलिस नियमों में स्वतः निरस्तीकरण का प्रावधान नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब पुलिस नियम, 1934 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो समाप्त हो चुके आपराधिक मामले की जानकारी न देने पर आवेदन को स्वतः निरस्त करने की अनुमति देता हो।इस आधार पर न्यायालय ने विभागीय कार्रवाई को अनुचित और यांत्रिक करार दिया।