चंडीगढ़/यूटर्न/28 जुलाई। नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) का जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह अब पूरे भारत में नागरिकों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के लिए एक मॉडल बनता जा रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवाने में सीजेपी की सफलता से प्रेरित होकर, कई मुद्दों पर आधारित समूह जैसे 'रिज़र्वेशन हटाओ' अभियान और इथेनॉल-मिश्रित ईंधन का विरोध करने वाली 'ई20 जनता पार्टी' अब अपनी मांगों को मनवाने के लिए वैसी ही ब्रांडिंग, सोशल मीडिया रणनीतियों और विरोध के तरीकों को अपना रहे हैं। इनमें सबसे नया 'रिज़र्वेशन हटाओ' अभियान है, जिसने आरक्षण नीतियों पर देशव्यापी बहस की मांग करके सीजेपी द्वारा बनाए गए माहौल का फायदा उठाने की कोशिश की है। आयोजकों ने पारंपरिक राजनीतिक संगठनों से परे एक बड़ा समर्थन आधार बनाने के लिए जानबूझकर इस आंदोलन के विकेंद्रीकृत ढांचे, डिजिटल-फर्स्ट पहुंच और युवाओं पर केंद्रित संदेशों को अपनाया है।
20 प्रतिशत इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल का विरोध
वहीं, 'ई20 जनता पार्टी' 20 प्रतिशत इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल को पूरे देश में लागू करने का विरोध करने के लिए सामने आई है। समूह का तर्क है कि उपभोक्ताओं के पास पारंपरिक पेट्रोल खरीदने का विकल्प होना चाहिए और उन्होंने केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग की है, साथ ही प्रधान के खिलाफ सीजेपी के सफल अभियान का उदाहरण भी दिया है।
सोशल मीडिया पर निर्भर आंदोलन
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ये अभियान पारंपरिक पार्टी की राजनीति के बजाय मुद्दों पर आधारित लामबंदी के एक नए मॉडल को दर्शाते हैं। स्थायी राजनीतिक संगठन बनाने के बजाय, ये समूह विशिष्ट शिकायतों को लेकर नागरिकों को एकजुट कर रहे हैं और लोकप्रियता हासिल करने के लिए काफी हद तक हास्य, व्यंग्य, मीम्स और सोशल मीडिया पर निर्भर हैं, ठीक वैसे ही जैसे सीजेपी ने अपने देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान किया था।
सीजेपी बनी मिसाल
परीक्षा सुधारों को लेकर 36 दिनों के आंदोलन के बाद प्रधान के इस्तीफे और केंद्र सरकार को बातचीत के लिए मजबूर करने के कारण, सीजेपी खुद ही विरोध प्रदर्शन करने वाले नए आंदोलनों के लिए एक मिसाल बन गई है। इसकी सफलता ने यह साबित कर दिया है कि डिजिटल रूप से संगठित और युवाओं के नेतृत्व वाले अभियान स्थापित राजनीतिक दलों के समर्थन के बिना भी राजनीतिक रियायतें हासिल करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
जन-लामबंदी में बदलाव का संकेत
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे अभियानों का बढ़ना जन-लामबंदी में बदलाव का संकेत है, जहां किसी खास मुद्दे पर आधारित आंदोलन अगर ऑनलाइन लोगों की भावनाओं से जुड़ने में सफल हो जाते हैं, तो वे तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। क्या 'रिज़र्वेशन हटाओ' कैंपेन, ई20 जनता पार्टी और दूसरे उभरते हुए प्लैटफ़ॉर्म सीजेपी जैसा राजनीतिक असर डाल पाएंगे, यह तो पक्का नहीं है, लेकिन उन्होंने यह ज़रूर दिखा दिया है कि 'कॉकरोच मूवमेंट' भारत की डिजिटल पीढ़ी के लिए विरोध-प्रदर्शन का एक व्यापक ब्लूप्रिंट बन गया है।
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