सरकारी साइकिल टेंडरों का पैटर्न बदला तो कई गुना बढ़ सकता है कारोबार, रोडस्टर इकाइयों और स्थानीय वेंडरों पर मंडराया संकट
लुधियाना, 23 जुलाई। देश के सरकारी साइकिल टेंडर बाजार में संभावित बदलाव को लेकर साइकिल उद्योग में हलचल तेज हो गई है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि दिल्ली सरकार द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जारी साइकिल खरीद टेंडर में आधुनिक स्पेसिफिकेशन वाली साइकिलों को शामिल किए जाने के बाद अब तमिलनाडु, असम और अन्य बड़े राज्यों के आगामी टेंडरों पर भी उद्योग की नजर टिक गई है।
उद्योग जगत में चर्चा है कि आने वाले समय में इन राज्यों के सरकारी टेंडरों में पारंपरिक रोडस्टर साइकिलों के बजाय माउंटेन टेरेन बाइक यानी MTB श्रेणी की साइकिलों को प्राथमिकता मिल सकती है। हालांकि, तमिलनाडु, असम अथवा किसी अन्य राज्य सरकार की ओर से अभी तक MTB साइकिलों को अनिवार्य करने या आगामी खरीद का प्रारूप बदलने संबंधी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
MTB साइकिलों से दोगुना हो सकता है टेंडर कारोबार
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बड़े राज्यों के सरकारी साइकिल टेंडर रोडस्टर से MTB मॉडल की ओर स्थानांतरित होते हैं तो टेंडर कारोबार के कुल मूल्य में बड़ा उछाल आ सकता है। MTB साइकिलों की प्रति यूनिट कीमत सामान्य रोडस्टर साइकिलों से काफी अधिक होती है। इसलिए साइकिलों की संख्या समान रहने पर भी सरकारी खरीद का कुल मूल्य करीब दोगुना होने की संभावना जताई जा रही है।
दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए करीब 1.30 लाख साइकिलों की खरीद का टेंडर जारी किया है। इसका अनुमानित मूल्य लगभग 90 करोड़ रुपये है। इस हिसाब से एक साइकिल की औसत कीमत करीब सात हजार रुपये बैठती है।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि दिल्ली जैसे बड़े सरकारी टेंडर में आधुनिक श्रेणी की साइकिलों का प्रवेश अन्य राज्यों की भविष्य की खरीद नीति को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सरकारी साइकिल बाजार केवल संख्या के आधार पर ही नहीं, बल्कि प्रति साइकिल अधिक मूल्य के कारण भी कई गुना विस्तार कर सकता है।
तमिलनाडु और असम के बड़े ऑर्डरों पर टिकी निगाहें
तमिलनाडु देश में विद्यार्थियों के लिए बड़े स्तर पर मुफ्त साइकिल वितरण योजना चलाने वाले प्रमुख राज्यों में शामिल है। उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, पिछले वर्षों में राज्य से अलग-अलग चरणों और श्रेणियों में लाखों साइकिलों की मांग निकलती रही है। कारोबारी अनुमान के मुताबिक कुछ वर्षों में यह संख्या करीब दस लाख तक पहुंची है।
वहीं, असम में भी सरकारी एवं प्रांतीयकृत स्कूलों के विद्यार्थियों को बड़े स्तर पर साइकिलें वितरित की जाती रही हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि वहां संभावित सरकारी मांग करीब पांच लाख साइकिलों तक हो सकती है। हालांकि, आगामी खरीद की वास्तविक संख्या टेंडर जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
उद्योग में तमिलनाडु और असम को मिलाकर करीब 15 लाख साइकिलों के संभावित बाजार की चर्चा चल रही है। यदि इनमें MTB साइकिलों को जगह मिलती है तो टेंडर कारोबार के मूल्य में भारी वृद्धि हो सकती है। फिलहाल इसे पक्का ऑर्डर नहीं, बल्कि पिछले खरीद पैटर्न और उद्योग के आकलन पर आधारित संभावित बाजार माना जा रहा है।
तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार की भावी कल्याणकारी योजनाओं और खरीद नीति पर भी उद्योग की निगाहें हैं। हालांकि, नई सरकार ने साइकिल योजना में MTB मॉडल अपनाने को लेकर अभी कोई आधिकारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है।
हाई-एंड पार्ट्स बाजार को मिलेगा विस्तार
MTB साइकिलों की मांग बढ़ने से केवल साइकिल बनाने वाली बड़ी कंपनियों को ही नहीं, बल्कि फ्रेम, फोर्क, गियर, ब्रेक, रिम, चौड़े टायर-ट्यूब, सैडल और अन्य आधुनिक कंपोनेंट बनाने वाली इकाइयों को भी नया बाजार मिल सकता है।
उद्योग जगत का मानना है कि यदि तमिलनाडु, असम और अन्य राज्य MTB स्पेसिफिकेशन वाले टेंडर जारी करते हैं तो हाई-एंड साइकिल पार्ट्स की मांग में तेजी आएगी। इसका सीधा लाभ उन कंपनियों को मिलेगा, जिन्होंने अपनी मशीनरी, डिजाइन, गुणवत्ता प्रणाली और उत्पादन क्षमता को पहले ही आधुनिक बना लिया है।
इस बदलाव से साइकिल उद्योग में नए निवेश, आधुनिक मशीनरी और तकनीकी अपग्रेडेशन को भी बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही स्थानीय कंपोनेंट निर्माताओं के लिए नए उत्पाद विकसित करने और बड़ी कंपनियों की आपूर्ति शृंखला से जुड़ने के अवसर पैदा होंगे।
रोडस्टर आधारित कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती
संभावित बदलाव का दूसरा पहलू पारंपरिक रोडस्टर साइकिलों पर निर्भर कंपनियों और वेंडरों के लिए चिंताजनक है। लुधियाना सहित देश की अनेक उत्पादन इकाइयां वर्षों से सरकारी टेंडरों के लिए बड़े पैमाने पर रोडस्टर साइकिल और उनके पार्ट्स बनाती रही हैं।
यदि सरकारी खरीद का रुख तेजी से MTB मॉडल की ओर जाता है तो उन इकाइयों को सबसे अधिक नुकसान हो सकता है, जिन्होंने समय के साथ अपनी मशीनरी, फ्रेम डिजाइन और उत्पादन तकनीक का उन्नयन नहीं किया। ऐसी कंपनियों को नई तकनीकी शर्तों को पूरा करने और बड़े सरकारी ऑर्डर हासिल करने में कठिनाई आ सकती है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि संभावित रोडस्टर टेंडरों को ध्यान में रखकर स्थानीय वेंडरों ने लगभग 500 करोड़ रुपये के विभिन्न पार्ट्स का स्टॉक और उत्पादन तैयार कर रखा है। अकेले टायर-ट्यूब निर्माताओं के पास करीब पांच लाख साइकिलों के लिए टायर और ट्यूब तैयार होने की चर्चा है। इन आंकड़ों की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
यदि अंतिम समय में टेंडर स्पेसिफिकेशन रोडस्टर से बदलकर MTB कर दिए जाते हैं तो पहले से तैयार माल के फंसने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे छोटे और मध्यम वेंडरों की कार्यशील पूंजी, भुगतान चक्र और उत्पादन व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
अपग्रेडेशन नहीं करने वाली इकाइयां हो सकती हैं बाहर
MTB निर्माण के लिए अलग डिजाइन के फ्रेम और फोर्क, चौड़े टायर, मजबूत रिम, आधुनिक ब्रेक तथा कई मामलों में गियर प्रणाली की आवश्यकता होती है। इनके निर्माण और असेंबली के लिए नई मशीनरी, प्रशिक्षित कर्मचारियों और बेहतर गुणवत्ता जांच प्रणाली की जरूरत पड़ती है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि जिन इकाइयों ने आधुनिक तकनीक में समय रहते निवेश नहीं किया है, उनके लिए नए टेंडर पैटर्न में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत, MTB और आधुनिक साइकिलों के निर्माण की क्षमता रखने वाली कंपनियों को बड़े सरकारी बाजार में बढ़त मिल सकती है।
उद्योग जगत ने मांग की है कि यदि राज्य सरकारें साइकिलों के स्पेसिफिकेशन में बड़ा बदलाव करती हैं तो निर्माताओं और वेंडरों को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। इससे पुराना स्टॉक समायोजित करने, मशीनरी अपग्रेड करने और नए कंपोनेंट विकसित करने का अवसर मिल सकेगा।
फिलहाल तमिलनाडु, असम या अन्य राज्यों ने आगामी सरकारी टेंडरों में MTB साइकिलों को अनिवार्य बनाने की कोई आधिकारिक नीति घोषित नहीं की है। उद्योग में चल रही चर्चा दिल्ली के टेंडर, पूर्व खरीद के आंकड़ों और संभावित बाजार रुझानों पर आधारित है। वास्तविक स्थिति संबंधित राज्यों के टेंडर दस्तावेज जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।