चंडीगढ़/यूटर्न/13 जुलाई। केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने एक्स पर पंजाब में उग्रवाद के दौर के कुछ पुराने वीडियो शेयर किए हैं। इन वीडियो से भाजपा और विपक्षी दलों में बेचैनी फैल गई है। कई नेताओं ने चेतावनी दी है कि ऐसे समय में जब राज्य अपने सबसे बुरे दौर से उबर रहा है, पुराने घावों को फिर से कुरेदना ठीक नहीं है। यह विवाद बिट्टू के सोशल मीडिया अकाउंट से पोस्ट किए गए वीडियो क्लिप को लेकर है। इन क्लिप्स में उग्रवाद के दौर की घटनाओं और पीड़ितों को दिखाया गया है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हुए हमलों से जुड़े फुटेज भी शामिल हैं। राजनीतिक नेताओं ने इन पोस्ट की आलोचना करते हुए कहा है कि दर्दनाक घटनाओं को चुनिंदा तरीके से फिर से दिखाने से पंजाब के नाजुक सामाजिक सद्भाव के बिगड़ने का खतरा है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इन पोस्ट से किनारा कर लिया है। उन्होंने संयम बरतने और राजनीतिक नेताओं से अपील की है कि वे राजनीतिक बहस के लिए दर्दनाक यादों को फिर से न उभारें।
अतीत से सीखने पर ध्यान देने की जरुरत
इस मुद्दे पर बात करते हुए पंजाब के पूर्व मंत्री मनोरंजन कालिया ने कहा कि पंजाब ने सालों तक आतंकवाद का सामना किया, लेकिन 1984 के दंगों के अशांत दौर में भी वहां सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई। उन्होंने कहा कि राज्य को चुनिंदा तस्वीरें और वीडियो फैलाने के बजाय अपने अतीत से सीखने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ये वीडियो पूरी ऐतिहासिक सच्चाई नहीं दिखाते।
विपक्षियों ने भी जताई चिंता
विपक्षी नेताओं ने भी इन पोस्ट पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि उग्रवाद की यादें हिंसा से प्रभावित परिवारों में आज भी गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करती हैं। यह घटनाक्रम ऐसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में हुआ है जब पार्टियां 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंजाब के अशांत अतीत से जुड़े मुद्दों का आज भी लोगों की भावनाओं पर गहरा असर पड़ता है और राज्य की राजनीतिक बहस में ये मुद्दे जल्द ही विवाद का विषय बन सकते हैं।
नाजुक संतुलन को उजागर किया
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री बिट्टू ने पंजाब की सुरक्षा और अलगाववाद से जुड़े मुद्दों पर अक्सर कड़ा रुख अपनाया है। हालांकि, ताजा विवाद से पता चलता है कि उग्रवाद के दौर की तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल करने को लेकर उनकी अपनी पार्टी में भी असहजता है। इस घटना ने एक बार फिर उस नाजुक संतुलन को उजागर किया है जो पंजाब के राजनीतिक नेताओं को राज्य के हिंसक अतीत पर चर्चा करते समय बनाए रखना होता है, यानी ऐतिहासिक यादों को संजोना और साथ ही ऐसी बयानबाजी से बचना जिससे पुरानी दरारें फिर से उभर सकती हैं।
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