भारत ने कहा- 2025 में संधि का निलंबन हालात की वजह से लिया गया फैसला, अब जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत परियोजनाओं को तेज गति से आगे बढ़ाया जाएगा।
नई दिल्ली (Naren Danu) : पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर कनाडा के माध्यम से मध्यस्थता की कोशिशों के बीच भारत ने अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, 1960 की सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी, क्योंकि सीमा पार आतंकवाद ने इस समझौते की मूल भावना और आपसी विश्वास को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
सूत्रों का कहना है कि भारत ने दशकों तक युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी संधि का सम्मान किया, लेकिन पाकिस्तान द्वारा लगातार आतंकवाद को संरक्षण देने और भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने से समझौते की बुनियाद कमजोर हो गई। ऐसे में वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को निलंबित करने का फैसला लिया गया था और अब पहले जैसी व्यवस्था में लौटने की संभावना नहीं है।
भारत का मानना है कि यदि भविष्य में कोई नई जल व्यवस्था या समझौता होता है तो उसमें जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, बढ़ती जल आवश्यकता, आधुनिक तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे वर्तमान मुद्दों को शामिल करना अनिवार्य होगा। साथ ही पाकिस्तान को पहले सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय रूप से पीछे हटना होगा।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि संधि के निलंबन के बाद स्थायी सिंधु आयोग की बैठकें, संयुक्त निरीक्षण, आंकड़ों का नियमित आदान-प्रदान और विवाद समाधान से जुड़े संस्थागत तंत्र फिलहाल निष्क्रिय हैं। हालांकि बाढ़ संबंधी आवश्यक सूचनाएं पूर्व की तरह राजनयिक माध्यमों से साझा की जाती रहेंगी।
इस बीच भारत ने सिंधु नदी प्रणाली के अपने हिस्से के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में परियोजनाओं को तेज कर दिया है। कीरू और पाकल दुल जलविद्युत परियोजनाएं इसी वर्ष शुरू होने की तैयारी में हैं, जबकि आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर में कई नई जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से हजारों मेगावाट अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है।
सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने वर्षों तक भारत की कई वैध जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्तियां दर्ज कर विकास कार्यों में बाधा पहुंचाई। भारत का कहना है कि तकनीकी मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाकर पाकिस्तान ने विवाद समाधान प्रक्रिया का दुरुपयोग किया, जबकि भारत अब अपनी जल और ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुरूप परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।