लुधियाना/यूटर्न/30 जून। लुधियाना नगर निगम में पहले एसई (सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर) संजय कंवर को टेंडरों में कमीशन लेने के आरोप में विजिलेंस ने गिरफ्तार किया था। वहीं अब निगम के एक और एसई पर टेंडरों में करोड़ों के घोटाले करने के आरोप लगे हैं। नगर निगम के जोन-बी में तैनात एसई प्रवीन सिंगला पर रिश्तेदारों को ठेकेदार बना उन्हें वर्क ऑर्डर दिलाकर करोड़ों रुपए का हेरफेर करने के आरोप लगे हैं। जिस संबंधी सीएम भगवंत मान को लिखित में शिकायत दी गई है। शिकायतकर्ता संजय गांधी कॉलोनी के रहने वाले राजिंद्र पाल सिंह है। जिनकी और से शिकायत में एसई के रिश्तेदारों के नाम, उनकी कंपनियां, कब कौनसा काम दिलाया और कितना फंड लिया, इसकी विस्तार से जानकारी दी गई है। आरोप है कि इन कंपनियों और उन्हें मिले टेंडरों की जांच होने पर बड़े खुलासे होंगे। हालांकि एसई प्रवीन सिंगला द्वारा इन आरोपों को सिरे से नकार दिया गया है। कुछ दिन पहले ही एसई प्रवीन सिंगला और अकाली दल पार्षद चतरवीर सिंह उर्फ कमल अरोड़ा में झगड़ा हुआ था। जिसके बाद पार्षद पर मामला दर्ज हुआ था। जिसके चलते उक्त शिकायत और उसमें लगाए आरोप कितने सही है या राजनीति से प्रेरित है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। उक्त शिकायत सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है।
26 सालों से एक ही जोन में ज्यादातर ड्यूटी, आखिर क्या है राज ?
शिकायत में राजिंद्र पाल सिंह ने आरोप लगाए हैं कि प्रवीन सिंगला पिछले 26 सालों से एक ही शहर में तैनात है। यहां तक कि उसकी ज्यादातर ड्यूटी जोन-बी में ही रही है। कुछ समय के लिए वे जोन-सी में भी तैनात रहे। राजिंद्र पाल सिंह का आरोप है कि इसके पीछे का कारण राजनीतिक छह है। क्योंकि जब जिस पार्टी की सरकार होती है, प्रवीन सिंगला उसी पार्टी के लीडर से संपर्क कर लेते हैं। जिसके बाद लीडर की शह होने के चलते आज तक कोई भी अधिकारी उनकी ट्रांसफर नहीं करवा सका। अगर किसी ने करवाई तो ज्यादा समय बरकरार नहीं रही। आरोप है कि एसई सिंगला का जोन-बी में पूरा होल्ड हैं। उनके कहे बिना पत्ता तक नहीं हिलता।
रिश्तेदार ठेकेदारों का बना रखा है गैंग
राजिंद्र पाल सिंह का आरोप है कि एसई प्रवीन सिंगला द्वारा अपने रिश्तेदारों को पहले नगर निगम में ठेकेदारी दिलाई और फिर उन्हें भारी भरकम रेट वाले टेंडर भी दिलाए। जिसमें एसई द्वारा मोटी कमीशन ली जाती है। राजिंद्र पाल सिंह का आरोप है कि एसई ने निगम में रिश्तेदार ठेकेदारों का गैंग बना रखा है। उसकी और से अपने रिश्तेदारों की कंपनियां ध्यान में रखकर एस्टीमेंट बनाए जाते हैं। फिर दूसरे अफसरों के साथ मिलकर टेंडर अपने रिश्तेदारों को दिलाए जा रहे हैं। आरोप है कि एसई के रिश्तेदार भी किसी भी हद तक जाकर लैस डालकर टेंडर ले लेते हैं। एस्टीमेंट ही उनके मुताबिक बना होने के चलते लैस देकर भी वे मोटी कमाई कर जाते हैं।
एसई द्वारा की जा रही फंडिंग
राजिंद्र पाल सिंह का आरोप है कि एसई प्रवीन सिंगला द्वारा अपने रिश्तेदारों को करोड़ों रुपए के टेंडर दिलाए जा रहे हैं। यह सिलसिला कई सालों से बरकरार है। कई अफसरों को इसकी जानकारी भी है। लेकिन आपसी मिलीभगत और एसई बाहुबली होने के चलते कोई डर के बोलता नहीं है। आरोप है कि एसई द्वारा अपने रिश्तेदारों को टेंडर दिलाने के लिए करोड़ों रुपए की फंडिंग भी की जाती है। कमीशन में कमाया पैसा, वे इसी में इन्वेस्ट करते हैं।
इनलिस्टमेंट में कंपनियों ने बताया रिश्तेदार
राजिंद्र सिंह की और से चार कंपनियों को एसई के रिश्तेदारों की कंपनियां बताया गया है। उनका आरोप है कि उक्त कंपनियों ने इनलिस्टमेंट के दौरान बताया हुआ है कि उनके रिश्तेदार निगम में मुलाजिम है। रिश्तेदार मुलाजिम होने पर किसी भी कंपनी को इनलिस्टमेंट नहीं किया जा सकता। लेकिन आपसी सेटिंग के चलते यह मुमकिन हो सका। राजिंद्र सिंह का आरोप है कि सभी कंपनियों की इनलिस्टमेंट भी एसई के कार्यकाल के दौरान हुई है।
10 साल के रिकॉर्ड की जांच में होंगे बड़े खुलासे
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उक्त कंपनियों को पिछले 10 साल के दौरान दिए टेंडरों का रिकॉर्ड चैक किया जाए। जिससे बड़े खुलासे होंगे। वहीं राजिंद्र सिंह द्वारा शिकायत में एसई के रिश्तेदारों की कंपनियों के नाम, उन्हें पहले मिले टेंडरों, मौजूदा टेंडरों की स्थिति और कितनी फंडिंग हुई है, इस संबंधी विस्तार से जानकारी दी गई है। जिस संबंधी जल्द खुलासा किया जाएगा। वहीं शिकायतकर्ता द्वारा जल्द एसई की प्रॉपर्टियों का भी खुलासा करने का दावा किया है।
झूठ बोलकर किया जा रहा गुमराह
एसई प्रवीन सिंगला का कहना है कि कुछ लोगों द्वारा झूठ बोलकर गुमराह किया जा रहा है। इन बातों का कोई अंत नहीं है। जब मर्जी, जिसके खिलाफ मर्जी शिकायत दे दो, इसमें क्या है। मेरा कोई भी रिश्तेदार ठेकेदार नहीं है। ठेकेदारों द्वारा इनलिस्टमेंट के दौरान सारी जानकारी जिला मजिस्ट्रेट फस्ट क्लास के रजिस्टर्ड एफिडेबिट दिए जाते हैं, फिर हेरफेर कैसे हो सकता है। दस्तावेजों की चैकिंग के बाद ही कंपनी निगम में रजिस्टर्ड होती है। जिसमें गलत होने की संभावना ही नहीं है।
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