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महाबंध एक उन्नत योग क्रिया है, जिससे व्यक्ति योगी बन सकता है ! लेकिन महाबंध करने से पहले ख़ुद को तैयार करना पड़ता है पहले प्राणायाम करें । खासकर दो प्राणायाम कपालभाति एवं अनुलोम विलोम । कम से कम 15 -15 मिनट। अगर इसके बिना आप बंध लगाते है तो शरीर को नुकसान हो सकता है।महाबंध में मूलबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बंध का एक साथ अभ्यास किया जाता है। प्राणमय शरीर को ऊर्जा से भर देता है । नाड़ियों को शुद्ध करने, रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से ऊर्जा को ऊपर उठाने और मन को शांत कर कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में मदद करता है। इस से आप की ऊर्जा उर्ध्वगामी हो जाती है जो सभी चक्रों का भेदन करते हुए सहस्रारचक्र पर स्थापित होकर निर्वाण की प्राप्ति करवाती है। महाबंध कैसे करते है आइए जानते है। स्थिति: सुखासन या पद्मासन में बैठें, रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और हथेलियों को घुटनों पर रखें। अपने हिप्स के नीचे तकिया रख सकते है। श्वास: लंबी गहरी गहरी सांस लें (पूरक), फिर पूरी सांस बाहर छोड़ें (रेचक)। सात बार सांस नाक से ले और मुंह से छोड़े। ऐसा करने पर शरीर की नकारात्मक ऊर्जा शरीर से बाहर हो जाती है। मूलबंध लगाए पहले अपनी गुदा यानि मलद्वार को अंदर की तरफ खींचे। रोक ले। इसके बाद उड्डियान बंध लगाए पेट की मांसपेशियों को अंदर-ऊपर की ओर खींचें। सांस को बाहर निकाल कर रोक ले और और फिर जालंधर बंध लगाए। ठोड़ी को छाती से लगाएं। 10 से 20 सेकंड तक। या आप की जितनी क्षमता हो सांस को रोक सकते है । शुरुआत में 10 से 20 सेकंड तक करना ही उचित होता है धीरे धीरे बढ़ाते जाए। समापन: पहले जालंधर बंध खोले फिर सांस ले यानि जब हम सांस लेंगे तो उड्डियान बंध खुलेगा फिर मूलबंध खोल दे। शांत होकर बैठें और गहरी सांस लें। महाबंध के मुख्य लाभ:इस अभ्यास से व्यक्ति योगी बनता है स्वयं को जानने की क्रिया शुरू होती हैं। मन शांत होता चला जाता है । तनाव खत्म होने लगता है चीजों को अच्छे से समझने की समझ आने लगती है।हर प्रतिकूल परिस्थिति को हल करने का ज्ञान आने लगता है।आपके हार्मोनल संतुलित हो जाते है अंतःस्रावी तंत्र स्वस्थ होने लगता है। पाचन शक्ति (मेटाबॉलिज्म सिस्टम) में सुधार होने लगता है। एंटी-एजिंग: शरीर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित हो जाती है काया कल्प होने लगता है। सावधानियां: उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अल्सर या गर्भावस्था में इसका अभ्यास मत करे।