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अंग्रजों के समय व्यापार का केंद्र जेजों दोआबा बना खंडहर - Uturn Time
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होशियारपुर दलजीत अज्नोहा होशियारपुर/ यूटर्न/ 18 मार्च।प्रत्येक क्षेत्र में ऐसा कोई न कोई गांव, शहर या कस्बा है जिसने इतिहास में अलग ही पहचान बना रखी है। बेशक किसी भी कारण उसकी पहचान को अनदेखा किया जाता होगा फिर भी कहीं न कहीं उसकी पहचान अपने आप प्रत्यश्व रूप में समक्ष आ ही जाती है। ऐसे ही जिला होशियारपुर के गांव नेजों दोआबा की मौजूदा समय बेशक पहचान धुंधली सी होकर रह गई है। गांव जेजों दोआबा अंग्रेजों के शासन से पहले किसी राजा की रियासत होती थी और उन दिनों राजपूत घराने का शासक देवा सिंह वा अंग्रेज शासन के विस्तार के समय हुई मुठभेड़ में शासक व पूरा परिवार बंदी बना लिया गया था और यह गांव अविभाजित पंजाब और हिमाचल का एक मात्र व्यापार केंद्र था। वहां से देश विदेश तक व्यापार किया जाता और यहां पर व्यापारी ऊंठों, घोड़ों पर सामान लाकर बेचते वे यहां पर पहले से ही खद्दर का बहुत व्यापार था। यहां से बना खद्दर ताशकंद (विदेश) तक जाता था जिला होशियारपुर में पहला रेलवे स्टेशन 1914 में इस गांव में बना था। इस गांव में देश सका बंटवारा होने से पहले लाहौर और कराची से सीधी रेल यहां आती थी, जिसमें मिर्चों और हल्दी आदि होती थी जिनका व्यापार बहुत बड़े स्तर पर होता था गांव में 25 बैड का अस्पताल तो है जिसमें स्टाफ के लिए 8 क्वार्टर और डाक्टरों के लिए 2 आलीशान कोठियां (घर) हैं परन्तु अस्पताल में कोई डाक्टर और न ही स्टाफ है सिर्फ एक डाक्टर सप्ताह में 2-3 बार आता है गांव में बिजली का 66 के. वी. सब स्टेशन है। यहां पर रेलगाड़ी जो पहले दिन में 3 बार आती जाती थी अभी पिछले समय से बिल्कुल बंद है जब के रेल सेवा शुरू होने उपरांत अगर इस लाइन को नंगल से जोड़ दिया जाए तो पंजाब और हिमाचल के लोगों को काफी सुविधा हो जाएगी और साथ सही धार्मिक स्थान श्री आनंदपुर साहिब जाने वाली संगत को काफी आसानी हो जाएगी। गांव में पी.एन. बी. की ए.टी.एम. मशीन, पोस्ट आफिस, पार्क आदि है जबकि पहले केपुरानी इमारतों में बना हुआ है गांव का बाजार गांव के पेड़े और अन्य मिठाई बहुत मशहूर है गांव में बना बाजार पुरानी इमारतों में बना हुआ है। कई दुकानदारों की ओर से उनकी मुरम्मत करवा ली है और कई दुकानदार उन पुरानी इमारतों के नीचे वाले तल में दुकानदारी करते है। गांव के भीतर जाकर देखा जाए तो कई बड़ी-बड़ी इमारते खंडहर बन चुकी है जो आसपास के पड़ोसी घरों के लिए कभी भी नुक्सान का कारण बन सकती है। मेन बाजार को जाती सड़क कई जगहों से टूटी पड़ी जिसमें खड्डे पड़े हुए है। अविभाजित पंजाब से पहले गांव की बाहरी ओर पूरी तरह से चारदीवारी थी और गांव में गलियों में गेट लगे होते जैसे खन्ना स्ट्रीट, जैन स्ट्रीट, सूद स्ट्रीट आदि थे इन गलियों में एक ही एंट्री होती थी जिस पर गेट लगा होता था जो निश्चित समय पर बंद कर दिया जाता था गांव के बाहर बार एक पहाड़ नुमा जगह थी। गांव के बिल्कुल बाहर एक ऊंचा टिल्ला है उस समय जब कोई व्यक्ति किसी तरह का क्राइम करता था जिसे फांसी की सजा सुनाई जाती थी उसे इस टिल्ले पर लेजाकर ऊपर से धक्का दिया जाता था ताकि उसकी सजा पूरी हो जाए। **किन नामों से जाना जाता था गांव को और क्यों* 1500 की आबादी वाले गांव में 27 जातियों के लोग रहते है। इस गांव को पहले फलेवाली के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि यहां फल के बहुत घने पेड़ होते थे। इन सबके साथ-साथ गांव को पंज पीरों की नगरी भी कहा जाता रहा, क्योंकि यहां पर धार्मिक स्थान तो काफी है और सभी वंदनीय है फिर भी पांच पीरों में बाबा औघड़नाथ जी, बाबा जीजू शाह शाह जी (जिनके नाम पर इस गांव का नाम पड़ा), बाबा मनोहर दास, दरबार बाबा खाकी शाह जी और जवाला पुरी जी है। इनके अतिरिक्त यहां पर जामा मस्जिद, जैन मुनी मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर और डेरा रत्नपुरी ,माता रानी मंदिर भी आस्था व श्रद्धा का केंद्र है और गांव के एक और महिलावाली है। यहां लोगों के मुताबिक राजा मान सिंह के महल होते थे वह भी एक पहाड़ीनुमा ऊंवाई पर है। **देश का कोई मैट्रो शहर या कस्बा नहीं जहां जेजों के व्यापारी न हो** जेजों दोआबा के खन्ना, जैन, सूद, और ब्राह्राण परिवार जब गांव में व्यापार कम होने लगा तो वह दूसरे शहरों में चले गए और वहां पर अपना व्यापार किया। आज देश के किसी भी कौने चले जाओ गांव जेजों दोआबा का कोई न कोई व्यक्ति जरूर मिलेगा अंग्रेजों के राज्यकाल में पूरे जिले से 5 लोग सरकार को टैक्स देते थे जिनमें 3 लोग जेजों दोआबा के थे जबकि उस समय जिला होशियारपुर का रकबा बहुत था जो अभी हिमाचल और रुपनगर में चला गया। उल्लेखनीय है कि इस गांव की पहचान को बरकरार रखने के लिए सरकार को समय समय पर इसकी मुरम्मत को ओर ध्यान देना चाहिए ता के इस कस्बे की पहचान बनी रहे **कैप्शन/खंडहर बना हुआ पुराना घर (दाएं) यह वह टिल्ला जब कोई जुर्म करता था जिसे उस समय की हुकूमत की ओर से फांसी की सजा दी जाती थी तो उसे इस टिल्ले पर ले जाकर धक्का देकर फेंक दिया जाता था। **कैप्शन/खंडहर बनी किसी समय की आलीशान कोठी, खतरा बनी सीधी खड़ी इमारत।