नवीन गोगना
लुधियाना 7 मार्च—हरियाणा में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव में नंबर गेम के हिसाब से कांग्रेस के लिए एक सीट मुश्किल नहीं है, मगर क्रॉस वोटिंग का डर है। अतीत में भी क्रॉस वोटिंग के दो किस्से ऐसे हैं, जिसने कांग्रेस के पास नंबर गेम होते हुए भी जीत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।
हरियाणा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 31 विधायकों का समर्थन चाहिए। राज्य की विधानसभा में 90 सदस्य हैं, जिनमें से बीजेपी के 48 विधायक हैं तो कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं। इसके अलावा दो विधायक इनेलो और तीन निर्दलीय विधायक हैं।
एक सीट जीतना आसान
तीनों निर्दलीय विधायक भाजपा के साथ हैं, जिन्होंने निर्दलीय सतीश नांदल का स्वयं नामांकन भरवाया है। इस लिहाज से कांग्रेस के लिए एक राज्यसभा सीट जीतना आसान लग रहा है, मगर पहले भी ऐसा हो चुका है, जब कांग्रेस के पास संख्याबल होने के बावजूद उसके प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा था।
साल 2016 में हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों पर चुनाव हुए थे, जिसमें तीन प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे थे। बीजेपी की तरफ से कांग्रेस छोड़कर गए चौधरी बीरेंद्र सिंह मैदान में थे तो कांग्रेस-इनेलो ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आरके आनंद को संयुक्त रूप से मैदान में उतारा था।
सीटों का गुणा भाग
सुभाष चंद्रा निर्दलीय तौर पर राज्यसभा चुनाव में तीसरे उम्मीदावर थे, जिन्हें बीजेपी का समर्थन हासिल था। बीजेपी के 47 विधायक थे जबकि कांग्रेस के 17 और इनेलो-अकाली दल के पास 20 विधायक थे। इस लिहाज से एक सीट बीजेपी और एक सीट विपक्ष को मिलनी तय थी।
इसी समीकरण को देखते हुए कांग्रेस-इनेलो ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आरके आनंद को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया था। आरके आनंद बाकायदा दिल्ली में सोनिया गांधी से मिलने भी गए थे, जिसके बाद उनकी जीत तय मानी जा रही थी।
निर्दलीय सुभाष चंद्र की जीत का कोई समीकरण नहीं बन रहा था। राज्यसभा चुनाव की वोटिंग हुई तो सारा गेम ही बदल गया। कांग्रेस के 17 में से 14 विधायकों ने वोटिंग के दौरान गलत पेन का इस्तेमाल कर लिया या उनसे हो गया, जिसके चलते उनके वोटों को अमान्य करार दे दिया गया, क्योंकि इनके बैलेट पेपर पर अलग रंग के पेन का इस्तेमाल हुआ था। इसका नतीजा यह हुआ कि दूसरी सीट पर बीजेपी समर्थित सुभाष चंद्रा जीत गए।
कहा जाता है कि कांग्रेस का एक मजबूत गुट आरके आनंद को समर्थन देने के लिए रजामंद नहीं था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने समर्थन का फैसला कर लिया तो सियासी खेल कर उन्हें हरा दिया गया था। तब पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपना वोट ही नहीं डाला था। उन्होंने इस बारे में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भी अवगत करा दिया था। ऐसे में सुभाष चंद्रा चुनाव जीत गए थे और बहुमत होते हुए भी आनंद को शिकस्त का सामना करना पड़ा था।
क्रॉस वोटिंग के सहारे कार्तिकेय ने माकन को हराया
साल 2022 में भी राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव हुआ था। विधायकों की संख्या के हिसाब से बीजेपी और कांग्रेस को एक-एक सीट मिलनी तय थी, लेकिन खेल हो गया। बीजेपी ने कृष्ण लाल पंवार (मौजूदा पंचायत मंत्री) तो कांग्रेस हाईकमान ने अपने विश्वासपात्र अजय माकन को प्रत्याशी बनाया।
पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद शर्मा ने अपने बेटे कार्तिकेय शर्मा को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतार दिया, जिन्हें बीजेपी ने समर्थन दिया। नंबर गेम में कार्तिकेय शर्मा के जीत की कोई भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन कांग्रेस विधायकों के चलते ही सारा गेम बदल गया।
तब कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं ने बड़ा खेला किया था। आज वह दोनों भाजपा में हैं। उनमें से एक सत्ता सुख प्राप्त कर रहे हैं, जबकि दूसरे सत्ता सुख के लिए काफी प्रयासरत हैं, मगर अभी तक उनके प्रयास सिरे नहीं चढ़े हैं।
राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के दौरान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने अपने वोट बीजेपी एजेंट को दिखाए थे। कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इन वोटों को रद करने की मांग की मगर वोट रद नहीं हुए थे।
नतीजा निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा जीत गए और कांग्रेस विधायकों की क्रास वोटिंग खुलकर सामने आई। ऐसा कहा जाता है कि किरण चौधरी और कुलदीप बिश्नोई ने अजय माकन की बजाय कार्तिकेय शर्मा को वोट दिए। नतीजतन अजय माकन को करारी मात खानी पड़ी।
सतीश नांदल को चुनाव जीतने पर भाजपा से करना पड़ेगा किनारा
हरियाणा भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश नांदल निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भले ही राज्यसभा चुनाव लड़ रहे हैं, मगर वे जीत जाते हैं तो उन्हें भाजपा से किनारा करना पड़ेगा। न ही अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वह भाजपा में शामिल हो सकते हैं।
भारतीय संविधान में दिए दल-बदल विरोधी प्रविधान के अनुसार निर्दलीय के तौर पर निर्वाचित सांसद अपने कार्यकाल दौरान किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हो सकता।
भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (2) जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है, उसमें स्पष्ट उल्लेख है कि सदन का कोई निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के अलावा किसी अन्य रूप में चुना गया है अर्थात जो निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीत कर निर्वाचित हुआ है, यदि वह ऐसे चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। फिलहाल भाजपा नेता होने पर भी निर्दलीय चुनाव लड़ने पर कोई आपत्ति नहीं है।