— ए. बी. नदवी, इस्लामिक स्कॉलर
युवा किसी भी राष्ट्र की असली ताक़त, उसकी ऊर्जा और उसका भविष्य होते हैं। किसी देश की दिशा और दशा इस बात पर निर्भर करती है कि उसके युवाओं की सोच कितनी संतुलित, उनका चरित्र कितना मज़बूत और उनका दृष्टिकोण कितना व्यापक है। आज का दौर डिजिटल क्रांति का दौर है—जहाँ तकनीक ने ज्ञान, संवाद और अवसरों के नए द्वार खोले हैं। लेकिन इसी डिजिटल विस्तार ने युवाओं के सामने एक गंभीर नैतिक और मानसिक चुनौती भी खड़ी कर दी है।
आज का युवा पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है—लेकिन विडंबना यह है कि वह भीतर से पहले से कहीं अधिक अकेला भी हो सकता है। मोबाइल स्क्रीन उसकी दुनिया बन गई है; सोशल मीडिया उसकी पहचान तय करने लगा है; और एल्गोरिदम उसकी सोच को दिशा देने लगे हैं। सीखने और आगे बढ़ने के अनगिनत अवसरों के साथ-साथ यह डिजिटल संसार भ्रम, भटकाव और भावनात्मक उकसावे का माध्यम भी बनता जा रहा है।
सोशल मीडिया अब केवल संवाद या मनोरंजन का मंच नहीं रह गया है। यह विचारों की लड़ाई का अखाड़ा बन चुका है। यहाँ सही और गलत, तथ्य और अफवाह, तर्क और उकसावे के बीच की रेखा बहुत पतली हो गई है। विशेष रूप से युवा—जो तकनीकी रूप से दक्ष हैं, परंतु अनुभव और विवेक की दृष्टि से अभी विकसित हो रहे होते हैं—अक्सर ऐसे कंटेंट से प्रभावित हो जाते हैं जो उनके भीतर गुस्सा, भय या अलगाव की भावना पैदा करता है।
युवावस्था स्वभावतः संवेदनशील और ऊर्जावान होती है। सामाजिक न्याय, धर्म, पहचान और कथित अन्याय जैसे मुद्दे युवाओं के मन को गहराई से छूते हैं। यही संवेदनशीलता, यदि सही मार्गदर्शन न मिले, तो उन्हें अतिवादी या भ्रामक विचारधाराओं की ओर मोड़ सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम इस प्रवृत्ति को और बढ़ा देते हैं—वे बार-बार वही सामग्री दिखाते हैं जिसे उपयोगकर्ता पहले देख चुका हो। परिणामस्वरूप एक “फिल्टर बबल” बन जाता है, जहाँ व्यक्ति केवल अपनी ही सोच से मेल खाते विचारों को देखता और सुनता है। धीरे-धीरे उसे यही लगने लगता है कि वही सोच पूरी दुनिया की सच्चाई है।
यह मानसिक घेरा खतरनाक हो सकता है। व्यक्ति दूसरों के दृष्टिकोण से कटने लगता है, संवाद की जगह टकराव ले लेता है, और असहमति को दुश्मनी समझने लगता है। कभी-कभी यही स्थिति युवाओं को ऐसे कदम उठाने पर मजबूर कर देती है जिनके परिणाम न केवल उनके लिए, बल्कि परिवार और समाज के लिए भी विनाशकारी हो सकते हैं।
इस संदर्भ में क़ुरआन की एक महत्वपूर्ण शिक्षा विशेष ध्यान देने योग्य है:
“ऐ ईमान वालों! यदि कोई फासिक तुम्हारे पास कोई खबर लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच कर लिया करो, ऐसा न हो कि तुम अनजाने में किसी को नुकसान पहुँचा दो और बाद में अपने किए पर पछताओ।”
(सूरह अल-हुजुरात, 49:6)
यह संदेश केवल धार्मिक मार्गदर्शन नहीं, बल्कि डिजिटल युग के लिए एक सार्वभौमिक सिद्धांत है—हर सूचना को परखो, सत्यापित करो और फिर स्वीकार करो।
आज कुछ ऑनलाइन पेज, चैनल और समूह जानबूझकर युवाओं की भावनाओं को भड़काने के लिए सामग्री तैयार करते हैं। वे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास, घृणा और अलगाव को बढ़ावा देते हैं। निजी मैसेज, गेम, क्विज़ या बंद समूहों के माध्यम से धीरे-धीरे युवाओं को एक विशेष विचारधारा की ओर धकेला जाता है। भावनात्मक रूप से अकेले या उपेक्षित महसूस करने वाले युवा इस जाल में जल्दी फँस सकते हैं।
हालाँकि भारत जैसे देश में मजबूत पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक संबंध इस खतरे को काफी हद तक कम करते हैं, फिर भी सतर्कता आवश्यक है। केवल पाबंदियाँ या आलोचना इस समस्या का समाधान नहीं हैं। वास्तविक समाधान है—जागरूकता, संवाद और विवेकपूर्ण मार्गदर्शन।
युवाओं को चाहिए कि वे विश्वसनीय और प्रमाणित स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें—राष्ट्रीय स्तर के जिम्मेदार मीडिया, मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान, प्रमाणित अकादमिक जर्नल और अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन। साथ ही, परिवार और मित्रों के साथ खुला संवाद बनाए रखें। कोई भी संदिग्ध या उकसाने वाला कंटेंट देखने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले रुकें, सोचें और किसी भरोसेमंद व्यक्ति से चर्चा करें।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जो हर युवा को स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या यह पोस्ट मुझे तुरंत गुस्सा दिलाने या डराने की कोशिश कर रही है?
क्या यह मुझे बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के लिए उकसा रही है?
क्या मैंने इसकी सत्यता की जाँच की है?
डिजिटल दुनिया से भागना समाधान नहीं है; उसे समझना और सजग रहकर उपयोग करना ही वास्तविक समाधान है। तकनीक एक साधन है—उसका सही या गलत उपयोग हमारे विवेक पर निर्भर करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएँ—ज्ञान, कौशल, संवाद और राष्ट्र निर्माण में। यदि वे तर्क, संयम और सत्य की कसौटी को अपनाएँ, तो डिजिटल दुनिया की कोई भी भ्रामक शक्ति उन्हें गुमराह नहीं कर सकती।
सचेत युवा ही सुरक्षित समाज की नींव हैं। और विवेकपूर्ण डिजिटल व्यवहार ही उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।