लेखक: राजेश धर
जम्मू, 10 फरवरी: जम्मू-कश्मीर की रणजी ट्रॉफी में शानदार वापसी ने भारतीय घरेलू क्रिकेट में नई ऊर्जा भर दी है। जो टीम कभी अंडरडॉग मानी जाती थी, वह आज नॉकआउट चरण की मजबूत दावेदार बन चुकी है। जुझारू वापसी, मैच जिताने वाली पारियां और अटूट संकल्प—ये अब संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का परिणाम हैं, जिसमें दूरदर्शी नेतृत्व, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और निरंतर तैयारी का समावेश है।
इस क्रांति के सूत्रधार हैं मिथुन मन्हास, जो जेकेसीए के पूर्व क्रिकेट संचालन एवं विकास निदेशक रह चुके हैं और अब बीसीसीआई के अध्यक्ष-निर्वाचित हैं। जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के लिए रणजी खेलने का अनुभव तथा आईपीएल का अनुभव रखने वाले मन्हास ने स्थिरता और निरंतरता पर जोर दिया। हाल ही में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “हमने प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को लगातार अवसर दिए हैं।”
शुभम खजूरिया, युधवीर सिंह, आकिब नबी, अब्दुल समद, आबिद मुश्ताक और कन्हैया वाधवान जैसे खिलाड़ियों को निरंतर समर्थन देकर—साथ ही अनुभवी और नए खिलाड़ियों का संतुलन बनाकर—जम्मू-कश्मीर ने अपनी टीम में गहराई और मजबूती पैदा की है। त्वरित बदलावों से बचते हुए खिलाड़ियों को समय दिया गया, जिससे कच्ची प्रतिभा निखरकर नॉकआउट मुकाबलों में दमक उठी।
इस सफलता की जड़ में पारदर्शी चयन प्रक्रिया है, जिसने पक्षपात को खत्म कर विश्वास को जन्म दिया। चयनकर्ताओं ने फॉर्म, फिटनेस और टीम संयोजन को प्राथमिकता दी, जबकि खुले ट्रायल ने पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाया। एक टीम सूत्र ने कहा, “पारदर्शिता से आत्मविश्वास बढ़ता है।”
ड्रेसिंग रूम का माहौल भी पूरी तरह बदल चुका है। अब न कोई भेदभाव है, न किसी का अहंकार—हर खिलाड़ी टीम का हिस्सा है। एक वरिष्ठ खिलाड़ी के शब्दों में, “यहां कोई स्टार नहीं, हम सब एक इकाई हैं।” टीम-बिल्डिंग गतिविधियों ने इस एकजुटता को और मजबूत किया है।
मुख्य कोच अजय शर्मा, जो पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय और दिल्ली रणजी के दिग्गज हैं, अपनी रणनीतिक सूझबूझ से टीम को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। उनकी सोच ने बल्लेबाजी को गहराई दी और गेंदबाजी में विविधता लाई। गेंदबाजी कोच पी. कृष्ण कुमार और फील्डिंग कोच दिशांत याज्ञिक के साथ मिलकर उन्होंने टीम की कमजोरियों को ताकत में बदला है।
कप्तान पारस डोगरा, 100 से अधिक प्रथम श्रेणी मैचों का अनुभव रखने वाले सधे हुए बल्लेबाज, उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्व करते हैं। मध्यक्रम में उनकी संयमित पारियां और संकट में शतक टीम को स्थिरता देते हैं। उनका अनुभव बताता है कि कठिन नॉकआउट मुकाबलों में धैर्य और समझदारी ही असली ताकत है।
प्रशासनिक स्तर पर भी दूरदर्शी योजना बनाई गई। पिछले और इस सत्र में दर्जनभर से अधिक अभ्यास मैच और एक्सपोजर टूर आयोजित किए गए, ताकि खिलाड़ियों को वास्तविक दबाव का अनुभव हो सके। जेकेसीए के सदस्य-प्रशासन ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता ने कहा, “ये सिर्फ मैच नहीं, सीखने के अवसर हैं।”
जम्मू-कश्मीर की यह कहानी भारतीय घरेलू क्रिकेट के लिए एक मिसाल बन चुकी है—प्रतिभा पर विश्वास, निष्पक्ष चयन, मजबूत नेतृत्व और अथक तैयारी। जैसे-जैसे टीम खिताब की ओर बढ़ रही है, यह स्पष्ट है कि यह सफलता क्षणिक नहीं, बल्कि एक मजबूत नींव पर खड़ी विरासत की शुरुआत है।
हमारी टीम को सेमीफाइनल में मजबूत बंगाल के खिलाफ शानदार विजय और इस सत्र की रणजी ट्रॉफी के फाइनल में गौरवपूर्ण सफलता की हार्दिक शुभकामनाएं! 🏏