एवोन साइकिल्स के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर ओंकार सिंह पाहवा ने पारिवारिक कारोबार को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अफ्रीका से शुरू हुआ निर्यात आज 60 देशों तक पहुंच चुका है। उद्योग और समाजसेवा में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित पाहवा ने एक विशेष बातचीत में अपने संघर्ष, व्यापारिक अनुभव, बदलते बाजार और नई पीढ़ी की भूमिका पर खुलकर अपने विचार साझा किए।
लुधियाना : हर बड़ी पहचान के पीछे एक छोटा-सा सपना और एक साधारण-सा आइडिया छिपा होता है। कुछ ऐसा ही सफर एवोन साइकिल्स के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर ओंकार सिंह पाहवा का रहा है। परिवार से मिले कारोबार को उन्होंने नई सोच, मेहनत और बदलते बाजार की जरूरतों के साथ आगे बढ़ाया। अफ्रीका से शुरू हुई एक्सपोर्ट की कोशिश आज करीब 60 देशों तक पहुंच चुकी है। उद्योग में योगदान और समाजसेवा के लिए उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। एक खास बातचीत में ओंकार सिंह पाहवा ने अपने सफर, संघर्ष, कारोबार और अगली पीढ़ी को लेकर खुलकर बात की।
सवाल: आपका साइकिल कारोबार से जुड़ने का सफर कैसे शुरू हुआ?
जवाब: मेरे पिता और चाचा ने 1951 में मिलकर कंपनी शुरू की थी और 1952 में साइकिल का उत्पादन शुरू हुआ। जब मैंने कारोबार संभाला, तब यह बिजनेस पहले से ही परिवार में चल रहा था। मैं इसके साथ-साथ बड़ा हुआ और धीरे-धीरे कारोबार का हिस्सा बन गया। 1973 में रोजाना करीब 1,000 से 1,200 साइकिल का उत्पादन होता था और एक्सपोर्ट बहुत कम था। अक्टूबर 1974 में मुझे पहली बार अफ्रीका के बाजार में एक्सपोर्ट करने का मौका मिला। यहीं से हमारी एक्सपोर्ट जर्नी शुरू हुई। इसके बाद यूरोप और दूसरे देशों में भी बाजार बनाए। आज हम करीब 60 देशों में साइकिल एक्सपोर्ट करते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए अलग-अलग मॉडल तैयार किए जाते हैं और हमारे उत्पाद अफ्रीका, मिडिल ईस्ट, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचते हैं।
सवाल: जब लोग आपको ब्रांड के नाम से पहचानते हैं तो परिवार से मिली विरासत को आगे बढ़ाने का एहसास कैसा होता है?
जवाब: यह गर्व की बात है। जब मैंने 1973 में कारोबार शुरू किया था, तब साइकिल के बहुत कम मॉडल हुआ करते थे। ज्यादातर साइकिलें एक जैसे डिजाइन और रंगों में होती थीं। हमने महसूस किया कि विदेशों में ग्राहक अलग-अलग रंग, मॉडल और डिजाइन पसंद करते हैं। 1984 के बाद हमने अलग-अलग रंगों और डिजाइनों में साइकिल बनाना शुरू किया।
शुरुआत में बच्चों की साइकिल बनाने के बारे में भी हमने नहीं सोचा था, लेकिन धीरे-धीरे बाजार की मांग बदली। आज हम दो साल की उम्र के बच्चों के लिए भी साइकिल बनाते हैं। इसी तरह महिलाओं के लिए पहले सिर्फ एक तरह का ‘राउंड बार’ मॉडल हुआ करता था। हमने छोटी उम्र की लड़कियों और महिलाओं की जरूरत के हिसाब से नए मॉडल तैयार किए। मेरा मानना है कि बाजार की जरूरत को समझना और उसके हिसाब से खुद को बदलना बहुत जरूरी है।
सवाल: क्या आपको कभी लगा कि कारोबार में अपना कुछ अलग करना है?
जवाब: जब मैंने एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट संभाला तो मेरा पूरा फोकस विदेशी बाजारों को समझने पर था। मैं अलग-अलग देशों में जाता, वहां के मॉडल देखता और समझता कि ग्राहक क्या चाहते हैं। फिर उसी के मुताबिक भारत में उत्पादन को तैयार करने की कोशिश करता। मेरे चाचा और पिता के साथ काम करते हुए और भगवान की कृपा से हमने कई ऐसे बाजार बनाए, जहां पहले हमारे उत्पाद नहीं बिकते थे।
लेकिन उस समय कारोबार करना आज जितना आसान नहीं था। लुधियाना में फोन भी मैनुअल सिस्टम से चलते थे। किसी नंबर पर बात करने के लिए एक्सचेंज ऑपरेटर से कनेक्शन लेना पड़ता था। दिल्ली या मुंबई में बात करने के लिए कॉल बुक करनी पड़ती थी और कई बार सुबह बुक की गई कॉल शाम को कनेक्ट होती थी।
न कूरियर था, न ई-मेल और न ही आज जैसी तेज कम्युनिकेशन सुविधा। जरूरी दस्तावेज पहुंचाने के लिए लोगों को दिल्ली या मुंबई तक भेजना पड़ता था। अकाउंट्स का पूरा काम मैनुअल होता था और कैलकुलेटर भी नहीं थे।
मुझे आज भी याद है, जब भारत में बना पहला कैलकुलेटर आया था। उसकी कीमत करीब 77-78 रुपये थी। मैंने एक कैलकुलेटर खरीदा और उसे अपने पास रखा। बाद में विदेश जाते समय मैंने मुंबई एयरपोर्ट पर अपनी घड़ी, ईयरिंग, सोने का कड़ा और कैलकुलेटर तक घोषित किया था। कस्टम अधिकारी ने कहा कि घड़ी, कड़ा और बाकी सामान तो ठीक है, लेकिन कैलकुलेटर भारत में बना है, इसलिए इसे ले जा सकते हैं। उस समय कैलकुलेटर रखना भी बड़ी बात हुआ करता था।
इसके बाद कंप्यूटर और फैक्स मशीन का दौर आया। मुझे याद है कि जब पहली फैक्स मशीन मुंबई लाई गई तो उसकी कीमत करीब 1.25 लाख रुपये थी। हमने मशीन खरीदी और बहुत उत्साहित थे कि एक जगह कागज डालेंगे और वह दूसरी जगह पहुंच जाएगा। लेकिन कस्टम अधिकारियों ने ड्यूटी को लेकर सवाल खड़े कर दिए और 50 हजार रुपये अतिरिक्त भुगतान करने की बात कही। वह ऐसा दौर था जिसे हमने अपनी आंखों से बदलते हुए देखा है।
सवाल: आपको पद्मश्री मिलने की खबर जब मिली तो वह पल कैसा था?
जवाब: मुझे 25 तारीख की शाम को पता चला कि मेरा नाम पद्मश्री की सूची में है। यह मेरे लिए बेहद सुखद और यादगार सरप्राइज था। इसके बाद राष्ट्रपति भवन में समारोह हुआ। मंत्रालय की तरफ से पहले ही जानकारी मांगी गई कि हमारे साथ कौन-कौन आएगा, ताकि रहने की व्यवस्था की जा सके। हमें रिहर्सल के लिए एक दिन पहले पहुंचना था।
मुख्य समारोह शाम को हुआ और करीब 70 लोगों को पद्मश्री सम्मान दिया गया। पूरा कार्यक्रम करीब एक घंटे में बहुत व्यवस्थित तरीके से पूरा हुआ। राष्ट्रपति से व्यक्तिगत रूप से सम्मान प्राप्त करना मेरे लिए जिंदगी के सबसे खास पलों में से एक रहा।
सवाल: पद्मश्री मिलने के बाद जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो इस सम्मान का श्रेय किसे देते हैं?
जवाब: यह सब मेरे पिता, चाचा और मां के आशीर्वाद से हुआ। उन्होंने यह काम शुरू किया था। मैंने सिर्फ उसे संभाला, आगे बढ़ाया और लोगों की मदद के लिए कुछ काम करने की कोशिश की। जो भी किया, उसकी नींव उन्होंने रखी थी। आज भी उन्हीं का आशीर्वाद हमें आगे बढ़ा रहा है।
सवाल: अब आपके बेटे भी कारोबार से जुड़ रहे हैं। परिवार की यह विरासत आगे बढ़ते देख कैसा लगता है?
जवाब: मैंने अपने पिता से जो कारोबार लिया था, उसे अब अपने बच्चों को सौंप रहा हूं। रितेश काम को आगे बढ़ा रहे हैं और बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। कारोबार अच्छी तरह बढ़ रहा है। दोनों बेटे बहुत मेहनत कर रहे हैं।
मेरे और मेरे बेटों के बीच एक समानता यह भी है कि हमने बी.कॉम. किया और उसके बाद सीधे कारोबार में आ गए। मैंने भी ग्रेजुएशन के बाद आगे की पढ़ाई नहीं की और बिजनेस ज्वाइन कर लिया। लेकिन अब समय बदल चुका है। मुझे लगता है कि अगली पीढ़ी, यानी मेरे पोते, ग्रेजुएशन के बाद विदेश जाकर हायर एजुकेशन हासिल करेंगे। यूरोप और अमेरिका में पढ़ाई के नए अवसर हैं। समय के साथ बदलाव जरूरी है।
सवाल: आपके सफर का सबसे बड़ा संघर्ष क्या रहा? अगर उस समय कोई ऐसी सुविधा उपलब्ध होती जो आज है, तो क्या आप और आगे बढ़ सकते थे?
जवाब: कारोबार में चुनौतियां हमेशा रहती हैं, लेकिन बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी चीज है ईमानदारी। इसके साथ धैर्य भी जरूरी है। कोई भी काम रातोंरात नहीं होता और सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है।
अगर आप ईमानदारी और मेहनत से काम करते हैं तो सफलता मिलने में समय जरूर लग सकता है, लेकिन सफलता जरूर मिलती है। मैं हमेशा लोगों से यही कहता हूं कि आगे बढ़ते रहिए, धैर्य रखिए और ईमानदारी से काम कीजिए। भगवान आपको उसका फल जरूर देगा। भगवान का न्याय देर से हो सकता है, लेकिन कभी इनकार नहीं होता।