चंडीगढ़ 29 March । बच्चों से जुड़े यौन अपराध मामलों में पंजाब की न्यायिक व्यवस्था को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में पोकसो एक्ट के तहत सैकड़ों मामले दर्ज होने के बावजूद उनकी सुनवाई के लिए पर्याप्त विशेष अदालतें उपलब्ध नहीं हैं।
आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में पोकसो कानून के तहत 782 केस दर्ज किए गए, लेकिन इनकी सुनवाई के लिए केवल 12 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) ही कार्यरत हैं। इनमें भी महज तीन अदालतें ही विशेष रूप से पोकसो मामलों के लिए समर्पित हैं। ऐसे में मामलों के निपटारे में देरी होना तय माना जा रहा है।
तुलनात्मक रूप से हरियाणा की स्थिति बेहतर नजर आती है। वहां 2044 मामलों के लिए 18 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट मौजूद हैं, जिनमें 14 एक्सक्लूसिव पोकसो अदालतें शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों की अधिक संख्या के कारण हरियाणा में मामलों की सुनवाई अपेक्षाकृत तेज हो पाती है।
अन्य राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे है, जहां 218 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित हैं। वहीं मध्य प्रदेश, केरल, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में भी पर्याप्त संख्या में विशेष अदालतें स्थापित की गई हैं, जो मामलों के त्वरित निपटारे में मदद कर रही हैं।
केंद्रीय Ministry of Law and Justice के अनुसार, देशभर में कुल 774 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रहे हैं, जिनमें 398 पोकसो अदालतें शामिल हैं। इन अदालतों ने अब तक लाखों मामलों का निपटारा किया है, लेकिन बढ़ते मामलों के मुकाबले यह संख्या अभी भी चुनौती बनी हुई है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देशभर में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1.77 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें से लगभग 38% पोकसो एक्ट के तहत हैं। इस पर संसद की स्थायी समिति ने भी चिंता जताते हुए राज्यों को न्यायिक ढांचा मजबूत करने, फंड का प्रभावी उपयोग करने और निगरानी बढ़ाने की सिफारिश की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब में यदि जल्द ही फास्ट ट्रैक और विशेष पोकसो अदालतों की संख्या नहीं बढ़ाई गई, तो बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों में न्याय में देरी एक बड़ी समस्या बन सकती है।