चंडीगढ़/यूटर्न/25 जून। एयर इंडिया की फ़्लाइट 182 में बम धमाके के चार दशक से ज़्यादा समय बाद, जिसमें 329 लोग मारे गए थे, कनाडा की मुख्य खुफिया एजेंसी 'कैनेडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस' (सीएसआईएस) ने पहली बार साफ़ तौर पर कनाडा में मौजूद खालिस्तानी आतंकवादियों को विस्फोटक लगाने का दोषी ठहराया है। जहाँ नई दिल्ली शुरू से ही कहती रही है कि 1985 की यह त्रासदी एक खालिस्तानी साज़िश थी, वहीं ओटावा ने अब तक सार्वजनिक रूप से इस आंदोलन का नाम लेने से परहेज किया था। बुधवार को इस त्रासदी की याद में किए गए एक फ़ेसबुक पोस्ट में, सीएसआईएस ने सीधे तौर पर इस हमले के लिए अलगाववादी आंदोलन को ज़िम्मेदार ठहराया। एजेंसी ने कहा 23 जून 1985 को, कनाडा में मौजूद खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा लगाए गए बम ने विमान को नष्ट कर दिया, जिससे उसमें सवार सभी लोग मारे गए, जिनमें से ज़्यादातर कनाडाई थे। यह कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा कम्युनिटी के लिए एक अहम मोड़ बना हुआ है।
टोरंटो से मुंबई जा रही थी फ्लाइट
टोरंटो से मुंबई जा रही एयर इंडिया की फ़्लाइट 182 (बोइंग 747, जिसे 'सम्राट कनिष्क' नाम दिया गया था) में बम धमाका कनाडा के इतिहास का सबसे बुरा आतंकवादी हमला था और 2001 में 11 सितंबर के हमलों तक यह दुनिया का सबसे घातक एविएशन टेररिज़्म (विमानन आतंकवाद) का मामला था। प्रतिबंधित खालिस्तानी समूह 'बब्बर खालसा' के सदस्यों द्वारा सामान रखने वाले हिस्से (लगेज कम्पार्टमेंट) में लगाए गए बम के कारण हुए धमाके ने अटलांटिक महासागर के ऊपर विमान के परखच्चे उड़ा दिए, जिससे उसमें सवार सभी यात्री और क्रू मेंबर मारे गए। 2005 में, खालिस्तानी आंदोलन को साफ़ तौर पर दोषी ठहराने का सीएसआईएस का यह फ़ैसला, एजेंसी द्वारा अपनी सालाना रिपोर्ट जारी करने के कुछ ही महीनों बाद आया है।
कनाडा को इतना समय क्यों लगा?
यह देरी मुख्य रूप से कनाडा की सुरक्षा व्यवस्था में हुई एक बड़ी विफलता के कारण हुई। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जॉन मेजर की अध्यक्षता में 2010 में हुई एक सार्वजनिक जांच में यह निष्कर्ष निकला कि राष्ट्रीय एजेंसियों से गलतियों की एक श्रृंखला (लगातार कई गलतियाँ) हुई थीं, जिसने इस मामले को बुरी तरह कमज़ोर कर दिया था। सबसे गंभीर बात यह है कि कैनेडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस (सीएसआईएस) और रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (आरसीएमपी) के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर हुई ज़बरदस्त खींचतान ने जांच को ठप कर दिया। जहाँ एक ओर सीएसआईएस ने बब्बर खालसा के नेता तलविंदर सिंह परमार पर कड़ी नज़र रखी थी, वहीं दूसरी ओर एजेंसी ने वायरटैप की सैकड़ों घंटों की अहम रिकॉर्डिंग नष्ट कर दीं, जिससे वे सबूत मिट गए जिनके आधार पर तेज़ी से आपराधिक सज़ा दिलाई जा सकती थी।
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