पिंडतारक तीर्थ में सोमवती अमावस्या पर उमड़ी भारी भीड़, श्रद्धालुओं ने किया स्नान, तर्पण और पिंडदान
जींद: हरियाणा के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल Pindtarak Tirth (पांडु पिंडारा) में ज्येष्ठ मास की सोमवती अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह उमड़ पड़ा। देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर में स्नान कर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण किया।
रविवार रात से ही पहुंचने लगे श्रद्धालु
तीर्थ स्थल पर श्रद्धालुओं का आगमन रविवार शाम से ही शुरू हो गया था। विभिन्न धर्मशालाओं में पूरी रात भजन-कीर्तन, सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता रहा। सोमवार सुबह होते ही श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर में स्नान कर धार्मिक अनुष्ठान शुरू कर दिए, जो दोपहर तक जारी रहे।
श्रद्धालुओं ने पितरों की शांति और मोक्ष की कामना के साथ पिंडदान किया तथा सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की।
मेले में रही रौनक, जमकर हुई खरीदारी
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ तीर्थ परिसर में लगे अस्थायी बाजारों में भी खूब चहल-पहल देखने को मिली। बच्चों ने खिलौने और मनोरंजन की वस्तुएं खरीदीं, जबकि महिलाओं और अन्य श्रद्धालुओं ने घरेलू उपयोग का सामान खरीदा। पूरे क्षेत्र में मेले जैसा माहौल बना रहा।
शुभ योगों ने बढ़ाया धार्मिक महत्व
जयंती देवी मंदिर के पुजारी Naveen Shastri के अनुसार इस वर्ष की पहली सोमवती अमावस्या ज्येष्ठ मास में पड़ी है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर मृगशिरा नक्षत्र, सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग जैसे विशेष शुभ संयोग भी बने, जिन्हें पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
महाभारत काल से जुड़ी है मान्यता
पिंडतारक तीर्थ के बारे में प्रचलित मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने अपने पूर्वजों और युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि सोमवती अमावस्या आने पर उन्होंने इसी स्थल पर पिंडदान किया था।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी वजह से हर वर्ष सोमवती अमावस्या और विशेष रूप से पितृ कर्म से जुड़े अवसरों पर देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
इस बार भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने पिंडतारक तीर्थ को आस्था, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह का केंद्र बना दिया।