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संभल की सियासत: अखिलेश यादव के लिए अग्निपरीक्षा - Uturn Time
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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं, लेकिन संभल की सियासत में हलचल अभी से तेज हो चुकी है। बीते कुछ महीनों में सांप्रदायिक हिंसा और प्रशासनिक सख्ती के बाद संभल जैसे संवेदनशील इलाके में राजनीति थोड़ी संभलती दिखी ही थी कि अब समाजवादी पार्टी के भीतर ही सत्ता और वर्चस्व की जंग खुलकर सामने आ गई है। सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के पिता मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। उनका सीधा निशाना मौजूदा विधायक नवाब इकबाल महमूद हैं, जो लगातार सात बार से संभल सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस ऐलान ने न सिर्फ स्थानीय राजनीति को गर्माया है, बल्कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। संभल विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन गिनी-चुनी सीटों में है, जहां समाजवादी पार्टी की जड़ें बेहद गहरी रही हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 से लेकर 2022 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में यह सीट लगातार सपा के खाते में रही है। नवाब इकबाल महमूद ने 1993 से लेकर अब तक सात बार जीत दर्ज की है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने करीब 52 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले थे। यह अंतर बताता है कि संभल में नवाब की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत रही है। दूसरी ओर, लोकसभा स्तर पर बर्क परिवार का दबदबा रहा है। शफीकुर्रहमान बर्क कई बार सांसद रहे और उनके निधन के बाद जियाउर्रहमान बर्क ने 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर यह विरासत आगे बढ़ाई। अब ममलूकुर्रहमान बर्क के मैदान में उतरने के ऐलान ने दशकों पुरानी सियासी संतुलन की व्यवस्था को चुनौती दे दी है। अब तक सपा के भीतर एक अनकहा फॉर्मूला चलता रहा था विधानसभा नवाब परिवार के पास और लोकसभा बर्क परिवार के खाते में। लेकिन जियाउर्रहमान के सांसद बनने के बाद बर्क परिवार की महत्वाकांक्षा और बढ़ गई है। ममलूकुर्रहमान का दावा है कि संभल की जनता बदलाव चाहती है और मौजूदा विधायक से नाराज है। उनका तर्क है कि सिर्फ पुरानी जीतों के आधार पर टिकट नहीं मिलना चाहिए, बल्कि जनता के बीच सक्रियता और मुद्दों पर संघर्ष को भी देखा जाना चाहिए। संभल की जनसांख्यिकी इस लड़ाई को और दिलचस्प बनाती है। 2011 की जनगणना और बाद के चुनावी अनुमानों के अनुसार, इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 55 से 60 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसके अलावा दलित और पिछड़े वर्ग के वोट भी निर्णायक भूमिका में रहते हैं। समाजवादी पार्टी की रणनीति लंबे समय से एम-वाई, यानी मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी रही है। ऐसे में संभल जैसी सीट सपा के लिए बेहद अहम है, जहां आपसी कलह का सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है। 2022 के चुनाव में भले ही सपा जीती हो, लेकिन भाजपा ने अपना वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत तक बढ़ाया था, जो खतरे की घंटी मानी जाती है। नवाब इकबाल महमूद अब अपने बेटे सुहेल इकबाल को सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं। यह कदम भी पार्टी के भीतर असंतोष की वजह बन रहा है। ममलूकुर्रहमान बर्क ने बिना नाम लिए तंज कसते हुए कहा है कि टिकट किसी के बेटे होने के आधार पर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर मिलना चाहिए। यह बयान सीधे तौर पर नवाब परिवार की वंशवादी राजनीति पर सवाल खड़ा करता है। दूसरी ओर, नवाब खेमा यह संकेत दे रहा है कि पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है और अंतिम फैसला अखिलेश यादव को ही करना है। उन्होंने यह भी पूछा है कि अगर पार्टी किसी और को टिकट देती है, तो क्या ममलूकुर्रहमान बर्क पूरी निष्ठा से चुनाव लड़ाएंगे। यह सियासी टकराव सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। संभल में बर्क और नवाब, दोनों परिवारों का प्रभाव आसपास की सीटों असमौली, गुन्नौर और चंदौसी तक फैला हुआ है। स्थानीय राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अगर यह विवाद खुली बगावत में बदलता है तो इसका असर कम से कम तीन से चार विधानसभा क्षेत्रों में सपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है। 2017 के चुनाव में पार्टी को आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा था, जब कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने नुकसान पहुंचाया था। अखिलेश यादव इस अनुभव को दोहराना नहीं चाहेंगे। संभल में हालिया हिंसा के बाद जियाउर्रहमान बर्क एक मुखर नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक अल्पसंख्यक मुद्दों को उठाया, जिससे उन्हें युवाओं और खासकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच नई पहचान मिली है। पार्टी के अंदर उन्हें सपा की मुस्लिम राजनीति के उभरते चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, नवाब इकबाल महमूद का कद एक अनुभवी नेता का है, जो मुलायम सिंह यादव की सरकार में मंत्री रह चुके हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं। यही वजह है कि अखिलेश यादव के लिए किसी एक पक्ष को नाराज करना आसान फैसला नहीं है। आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि संभल में सपा की जीत का अंतर धीरे-धीरे घट रहा है। 2012 में जहां पार्टी ने लगभग 18 प्रतिशत के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी, वहीं 2022 में यह अंतर सिमटकर करीब 13 प्रतिशत रह गया। अगर पार्टी के भीतर फूट पड़ती है तो यह अंतर और कम हो सकता है। भाजपा और बसपा दोनों ही इस मौके की ताक में हैं। भाजपा पहले ही पश्चिमी यूपी में सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है, जबकि बसपा को मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने का मौका मिल सकता है। अब सवाल यही है कि अखिलेश यादव इस उलझन को कैसे सुलझाते हैं। एक रास्ता यह हो सकता है कि वह दोनों परिवारों के बीच कोई समझौता कराएं, जैसे संगठन में एक को बड़ी जिम्मेदारी और टिकट दूसरे को। दूसरा विकल्प सर्वे के आधार पर टिकट देने का है, ताकि फैसला तथ्यों और आंकड़ों के सहारे लिया जा सके। लेकिन जिस तरह बयानबाजी तेज हो चुकी है, उससे मामला आसान नहीं दिखता। संभल की सियासत एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां एक गलत कदम पूरी रणनीति पर भारी पड़ सकता है। 2027 का चुनाव भले ही दूर हो, लेकिन संभल ने अभी से अखिलेश यादव की सियासी परीक्षा लेना शुरू कर दिया है।