चंडीगढ़/यूटर्न/18 जुलाई। एक संदिग्ध साइबर हमले में भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट, कुडनकुलम से जुड़ी हज़ारों फाइलें लीक हो गई हैं, जिससे देश के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर की साइबर सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। कहा जा रहा है कि यह डेटा 'वर्ल्ड लीक्स' नाम के रैंसमवेयर ग्रुप ने डार्क वेब पर पब्लिश किया था। इस ग्रुप का दावा है कि उसने प्रोजेक्ट से जुड़े संवेदनशील डॉक्यूमेंट्स हासिल कर लिए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 19,000 फाइलें जिनका साइज़ 14 जीबी से ज़्यादा है, लीक हुई हैं। इन डॉक्यूमेंट्स में तमिलनाडु में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट की यूनिट 3 और 4 के निर्माण से जुड़े इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट, इंस्पेक्शन रिपोर्ट, सप्लायर की जानकारी और इंश्योरेंस रिकॉर्ड शामिल बताए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि ये फाइलें प्लांट के ऑपरेशनल न्यूक्लियर सिस्टम से नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट से जुड़े एक कॉन्ट्रैक्टर के सिस्टम से जुड़ी हैं।
साइबर सुरक्षा घटना हुई
न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (जिसकी एक सब्सिडियरी कंपनी इस प्रोजेक्ट में शामिल है) ने माना कि एक साइबर सुरक्षा घटना हुई थी जिससे एक थर्ड-पार्टी सर्वर प्रभावित हुआ। हालांकि, दोनों ने कहा कि प्लांट के अहम ऑपरेशनल और रिएक्टर कंट्रोल सिस्टम बाहरी नेटवर्क से पूरी तरह अलग हैं और उनसे कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने भी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि कोई भी संवेदनशील या सुरक्षा से जुड़ा न्यूक्लियर डेटा लीक नहीं हुआ है और रिएक्टर के कोर सिस्टम में सेंध लगने की खबरें गलत हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत का न्यूक्लियर सुरक्षा ढांचा पूरी तरह सुरक्षित है।
लंबे समय के लिए सुरक्षा जोखिम हो सकते हैं पैदा
हालांकि, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भले ही रिएक्टर के ऑपरेशन पर कोई असर न पड़ा हो, लेकिन इंजीनियरिंग ड्रॉइंग, वेंडर की जानकारी और इंफ्रास्ट्रक्चर की डिटेल्स के लीक होने से लंबे समय के लिए सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकते हैं। इससे ऐसी कमज़ोरियां उजागर हो सकती हैं जिनका फायदा दुश्मन ताकतें उठा सकती हैं। इस घटना ने एक बार फिर रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने वाले रैंसमवेयर ग्रुप्स से बढ़ते खतरे को उजागर किया है।
2019 के साइबर हमले की यादें हुई ताजा
इस सेंधमारी से कुडनकुलम प्लांट पर 2019 में हुए साइबर हमले की यादें भी ताज़ा हो गई हैं, जब प्लांट के एडमिनिस्ट्रेटिव नेटवर्क पर मैलवेयर का पता चला था। हालांकि अधिकारियों ने तब स्पष्ट किया था कि ऑपरेशनल सिस्टम हमले से सुरक्षित थे, लेकिन ताज़ा घटना भारत के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को तेज़ी से जटिल होते साइबर खतरों से बचाने की लगातार बनी हुई चुनौती को रेखांकित करती है।
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