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77वां गणतंत्र दिवस 2026:वंदे मातरम के 150 वर्ष,आत्मनिर्भर भारत और बदलती वैश्विक भूमिका का ऐतिहासिक संगम- एक समग्र विश्लेषण - Uturn Time
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भारतीय सेना के पशु दल पहली बार कर्तव्य पथ पर मार्च करेंगे, जिसमें बैक्ट्रियन ऊंट,ज़ांस्कर टट्टू, शिकारी पक्षी और स्वदेशी कुत्तों की नस्लें शामिल होंगी भारत अपनी जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढ़ रहा है। 77वां गणतंत्र दिवस वास्तव में भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और अटूट राष्ट्रीय आत्मा का उत्सव होगा- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत एक बार फिर इतिहास के ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है,जहां परंपरा और भविष्य एक-दूसरे से हाथ मिलाते दिखाई दे रहे हैं।26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है और इस बार यह समारोह केवल एक संवैधानिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना,सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक कूटनीति का भव्य प्रदर्शन बनने जा रहा है। कर्तव्य पथ पर होने वाला यह आयोजन भारत की उस यात्रा का प्रतीक है,जिसमें वह औपनिवेशिक विरासत से निकलकर आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और वैश्विक नेतृत्वकर्ता राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है।इस वर्ष का गणतंत्र दिवस समारोह विशेष इसलिए भी है क्योंकि यह भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत न केवल स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा, बल्कि इसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक सांस्कृतिक और भावनात्मक आधार प्रदान किया। 2026 में जब कर्तव्य पथ पर ‘वंदे मातरम’ की गूंज सुनाई देगी, तब वह केवल एक गीत नहीं होगा, बल्कि डेढ़ सौ वर्षों के संघर्ष,बलिदान और संकल्प का सामूहिक स्मरण होगा। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यहमानता हूं कि यह सर्वेविदित है कि 26 जनवरी का दिन हर भारतीय के लिए गर्व, आत्मसम्मान और संविधान के प्रति निष्ठा का दिन होता है। यह वह दिन है जब भारत ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। 77 वर्षों की इस संवैधानिक यात्रा में भारत ने अनेक चुनौतियों का सामना किया, आर्थिक असमानता सामाजिक विविधता, सीमाई संघर्ष और वैश्विक दबाव। इसके बावजूद भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखते हुए निरंतर प्रगति की है। 2026 का गणतंत्र दिवस इसी लोकतांत्रिक परिपक्वता का उत्सव है।इस बार का समारोह पिछले वर्षों से कई मायनों में अलग और विशिष्ट होने वाला है। सबसे बड़ा प्रतीकात्मक परिवर्तन यह है कि कर्तव्य पथ पर दर्शकों के लिए वीआईपी लेबल को समाप्त कर दिया गया है।यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की उस भावना को सशक्त करता है, जिसमें सभी नागरिक समान हैं। दर्शक दीर्घाओं को अब गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी भारतीय नदियों के नाम दिए गए हैं। यह कदम न केवल सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है,बल्कि भारत की भौगोलिक,सभ्यतागत और पारिस्थितिक चेतना को भी रेखांकित करता है। साथियों बात अगर हम 26 जनवरी 2026 के 77वें गणतंत्र दिवस की थीम को समझने की करें तो, मुख्य विषय वंदे मातरम रखा गया है,जबकि आत्मनिर्भर भारत को द्वितीयक विषय के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।यह विषय चयन अपने आप में गहरा संदेश देता है।वंदेमातरम जहां भारत की आत्मा,संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति है, वहीं आत्मनिर्भर भारत भविष्य की ओर देखता हुआ संकल्प है। यह बताता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़कर ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना चाहता है। साथियों बात कर हम 2026 के गणतंत्र दिवस समारोह को अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष में समझने की करें तो यह इस दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।भारत- यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से ठीक पहले यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा का मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को रेखांकित करता है। यह उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं, बल्कि संकेत है कि भारत अब वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक संतुलन में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी यह दर्शाती है कि भारत-यूरोप संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी और वैश्विक स्थिरता के मुद्दों तक विस्तृत हो चुके हैं। गणतंत्र दिवस के मंच से यह संदेश जाएगा कि भारत किसी एक ध्रुव के साथ नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलन बनाने वाला प्रमुख स्तंभ है। साथियों बातें कर हम सैन्य परेड को समझने की करें तो यह इस बार भी समारोह का केंद्र बिंदु होगी,लेकिन2026 की परेड कई ऐतिहासिक नवाचारों के साथ सामनेआएगी भारतीय सेना के पशु दल पहली बार कर्तव्य पथ पर मार्च करेंगे, जिसमें बैक्ट्रियन ऊंट, ज़ांस्कर टट्टू, शिकारी पक्षी और स्वदेशी कुत्तों की नस्लें जैसे मुधोल और राजपालयम शामिल होंगी।यह केवल एक दृश्यात्मक आकर्षण नहीं बल्कि भारत की पारंपरिक सैन्य विरासत और जैवविविधता के प्रति सम्मान का प्रतीक है।सैन्य परेड में पहली बार बैटल ऐरे फॉर्मेट का प्रदर्शन किया जाएगा, जो आधुनिक युद्ध रणनीतियों, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध और स्वदेशी रक्षा तकनीक की क्षमता को प्रदर्शित करेगा। यह संदेश स्पष्ट होगा कि भारत न केवल हथियारों का आयातक नहीं, बल्कि रक्षा उत्पादन और नवाचार का उभरता हुआ वैश्विक केंद्र है। आत्मनिर्भर भारत की यह झलक भारत की सामरिक स्वतंत्रता को मजबूती प्रदान करती है।कर्तव्य पथ पर इस वर्ष कुल 30 झांकियां प्रस्तुत की जाएंगी, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता, राज्यों की विशिष्ट पहचान, तकनीकी प्रगति और सामाजिक नवाचारों को दर्शाएंगी। ये झांकियां केवल परंपरा का प्रदर्शन नहीं होंगी, बल्कि यह दिखाएंगी कि कैसे भारत अपनी विरासत को आधुनिक विकास के साथ जोड़ रहा है। साथियों बातें कर हम गणतंत्र दिवस 2026 में जनभागीदारी को विशेष महत्व को समझने की करें तो देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 10,हज़ार नागरिकों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है,जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में 2,500 कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। यह सहभागिता यह संदेश देती है कि गणतंत्र दिवस केवल सत्ता का उत्सव नहीं, बल्कि जनता का पर्व है।सरकार द्वारा माय भारत पोर्टल के माध्यम से नागरिकों को वंदे मातरम गायन और निबंध लेखन जैसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर दिया गया है। यह डिजिटल माध्यम नई पीढ़ी को राष्ट्रीय प्रतीकों से जोड़ने का सशक्त प्रयास है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत का राष्ट्रवाद समावेशी है, जिसमें हर नागरिक की भागीदारी महत्वपूर्ण है।77वां गणतंत्र दिवस समारोह यह भी दर्शाता है कि भारत अपनी पहचान को केवल अतीत में नहीं खोजता, बल्कि भविष्य के लिए नए प्रतिमान स्थापित करता है। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होना हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सतत जिम्मेदारी है। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प इसी जिम्मेदारी की आधुनिक अभिव्यक्ति है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह समारोह भारत की उस छवि को प्रस्तुत करेगा, जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, सैन्य रूप से सक्षम, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और लोकतांत्रिक रूप से सशक्त है। यह आयोजन यह संदेश देगा कि भारत न तो आक्रामक राष्ट्रवाद में विश्वास करता है और न ही निर्भरता में,बल्कि सहयोग, संतुलन और आत्मसम्मान के रास्ते पर चलता है। साथियों बात कर हम 26 जनवरी को राष्ट्रपति द्वारा और 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा झंडा वंदन करने को समझने की करें तो 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को राष्ट्रपति इसलिए संबोधन देती हैं क्योंकि राष्ट्रपति देश की संवैधानिक प्रमुख़ होती हैं।26 जनवरी को संविधान लागू हुआ था, और संविधान के सर्वोच्च संरक्षक राष्ट्रपति होते हैं।इस दिन राष्ट्र राज्य का उत्सव मनाता है,न कि सरकार का इसलिए यह भूमिका राष्ट्रपति की होती है।राष्ट्रपति सशस्त्र सेनाओं की सर्वोच्च कमांडर भी होती हैं, जबकि परेड उसी का प्रतीक है।वहीं 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) को प्रधानमंत्री लाल किले से बोलते हैं क्योंकि वह सरकार के प्रमुख होते हैं।यह दिन आज़ादी और सरकार की नीतियों,उपलब्धियों से जुड़ा होता है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 26 जनवरी 2026 का दिन केवल एक तिथि नहीं,बल्कि एक विचार एक भावना और एक संकल्प है।कर्तव्य पथ पर जब वंदे मातरम की गूंज आत्मनिर्भर भारत की झलक के साथ मिलेगी,तब यह स्पष्ट होगा कि भारत अपनी जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढ़ रहा है।77वां गणतंत्र दिवस वास्तव में भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और अटूट राष्ट्रीय आत्मा का उत्सव होगा। *-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425*