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भद्रकाली त्रिशूल, नंदी प्रतिमा और छह मुखी कार्तिकेय मूर्ति तमिलनाडु के मंदिरों से जुड़ी हैं
नई दिल्ली (Narendra Singh Danu) : भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी तीन दुर्लभ कलाकृतियां जल्द ही वापस देश लौटेंगी। ऑस्ट्रेलिया ने तमिलनाडु के मंदिरों से जुड़ी इन ऐतिहासिक धरोहरों को भारत को लौटाने का निर्णय लिया है। इनमें देवी भद्रकाली की आकृति वाला धातु का त्रिशूल, भगवान शिव के वाहन नंदी की पत्थर की प्रतिमा और छह मुख वाले भगवान कार्तिकेय की दुर्लभ मूर्ति शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए समझौतों के तहत इन कलाकृतियों को पूरे सम्मान के साथ भारत लाया जाएगा। ये धरोहरें चोल और विजयनगर-नायक काल की कला एवं धार्मिक परंपराओं की उत्कृष्ट मिसाल मानी जाती हैं। भद्रकाली त्रिशूल में दिखती है दक्षिण भारतीय कला की झलक वापस आने वाली प्रमुख कलाकृतियों में देवी भद्रकाली की आकृति वाला धातु का त्रिशूल शामिल है। यह पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाला त्रिशूल है, जिसके शीर्ष भाग पर देवी भद्रकाली का स्वरूप अंकित है। शैव-शक्ति परंपरा में इसे शक्ति, सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है। यह कलाकृति तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के कोल्लुमांगुडी स्थित श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर से संबंधित है। मंदिर का निर्माण चोल काल के अंतिम चरण से लेकर विजयनगर-नायक काल (13वीं से 16वीं शताब्दी) के बीच हुआ था। नंदी प्रतिमा में दिखाई देती है मंदिर स्थापत्य की बारीकी दूसरी कलाकृति भगवान शिव के परम भक्त और वाहन नंदी की पत्थर की प्रतिमा है। तमिल शैव परंपरा में नंदी को मंदिर के गर्भगृह की ओर मुख करके स्थापित किया जाता है और इसे भक्ति, शक्ति एवं धर्म का प्रतीक माना जाता है। इस प्रतिमा में नंदी को लेटी हुई मुद्रा में दिखाया गया है। गले में सजावटी घंटियां और आभूषणों की बारीक नक्काशी दक्षिण भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्टता को दर्शाती है। यह प्रतिमा भी श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर से जुड़ी हुई है। छह मुख वाले कार्तिकेय की दुर्लभ प्रतिमा भी लौटेगी तीसरी कलाकृति भगवान शिव के पुत्र भगवान कार्तिकेय (मुरुगन/षणमुख) की दुर्लभ पाषाण प्रतिमा है। इसमें भगवान कार्तिकेय को छह मुख और 12 भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। उनके हाथों में पारंपरिक अस्त्र 'वेल' (भाला) समेत अन्य हथियार दिखाए गए हैं, जबकि साथ में उनका वाहन मोर भी अंकित है। यह प्रतिमा तमिलनाडु के तंजावुर जिले के मनमबाड़ी गांव स्थित नागनाथस्वामी मंदिर की है। इसे चोल कालीन मूर्तिकला का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी में सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में बनाया गया था। सांस्कृतिक संबंधों को मिलेगी मजबूती भारत को प्राचीन कलाकृतियों की वापसी दोनों देशों के बीच बढ़ते सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों का संकेत है। यह कदम ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और उन्हें उनके मूल स्थानों तक वापस पहुंचाने की साझा प्रतिबद्धता को भी मजबूत करता है।