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विश्व को अस्थिर करता अमेरिका:- वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर- नाटो की अग्निपरीक्षा और यूरोपीय एकता की निर्णायक जीत-एक समग्र विश्लेषण - Uturn Time
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अंतरराष्ट्रीय कानून,बहुपक्षीय संवाद और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को प्राथमिकता देकर वैश्विक सहयोग का नया मॉडल बनाने की खास जरूरत यूरोप की एकता ने यह साबित किया है कि यदि देश सामूहिक रूप से खड़े हों,तो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र को भी पीछे हटने पर मज़बूर किया जा सकता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है,तब भी अमेरिका की विदेश नीति में एक पुराना साम्राज्यवादी आग्रह बार-बार उभरकर सामने आता है।अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संप्रभुता के सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए सैन्य दबाव,आर्थिक प्रतिबंध और टैरिफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करना अमेरिका की रणनीति का हिस्सा रहा है। वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की कोशिशें, ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति और अब ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के आक्रामक बयान,यह सब मिलकर एक ऐसे अमेरिका की तस्वीर पेश करते हैं जो वैश्विक स्थिरता का संरक्षक कम और अस्थिरता का कारक अधिक बनता जा रहा है।ग्रीनलैंड हमेशा डेनमार्क और यूरोपीय संप्रभुता का सवाल रहा हैं,ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्तशासी क्षेत्र है। इसका अर्थ यह है कि उसकी विदेश और रक्षा नीति डेनमार्क तथा यूरोपीय ढांचे से जुड़ी हुई है।जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे या उसे खरीदने जैसी बातों को सार्वजनिक मंच से दोहराया, तो यह केवल डेनमार्क ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा था।यूरोपीय देशों को यह एहसास हुआ कि यदि आज ग्रीनलैंड पर दबाव डाला गया, तो कल किसी और यूरोपीय क्षेत्र पर भी ऐसा ही प्रयास हो सकता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर यूरोप ने असामान्य रूप से एकजुट रुख अपनाया।ग्रीनलैंड का मामला नाटो के लिए भी एक निर्णायक परीक्षा बन गया। नाटो एक ऐसा सैन्य गठबंधन है जो सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि जब गठबंधन का सबसे शक्तिशाली सदस्य ही अपने सहयोगी देशों पर दबाव डालने लगे तो नाटो की नैतिकता और विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।यूरोपीय देशों ने स्पष्ट संकेत दिया कि नाटो का मतलब केवल अमेरिकी हितों की रक्षा नहीं, बल्कि सभी सदस्य देशों की संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।इस एकजुटता ने ट्रंप प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक कदम उठाना आसान नहीं होगा। वेनेजुएला और ईरान के मामलों में जहां अमेरिका को सीमित विरोध का सामना करना पड़ा था, वहीं ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोप एक स्वर में खड़ा दिखाई दिया। डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम सभी ने इस बात को स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का दबाव अस्वीकार्य है।यूरोपीय एकता ने ट्रंप के उस आत्मविश्वास को झटका दिया, जिसके तहत वे मानते थे कि आर्थिक या सैन्य दबाव डालकर किसी भी देश को झुकाया जा सकता है। साथियों बात कर हम वेनेजुएला और ईरान: हस्तक्षेप की पुरानी पटकथा को समझने की करें तो ग्रीनलैंड से पहले अमेरिका की नजर वेनेजुएला और ईरान पर रही है।वेनेजुएला में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को कमजोर करने,राष्ट्रपति को अपदस्थ करने और कथित अपहरण जैसी घटनाओं की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। यह सब अंतरराष्ट्रीय कानूनों और किसी भी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में गैर- हस्तक्षेप के सिद्धांत के सीधे उल्लंघन थे।इसी तरह ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध, सैन्य धमकियां और क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने की नीति ने मध्य-पूर्व को लंबे समय तक संघर्ष के दलदल में धकेल दिया।इन दोनों उदाहरणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति कूटनीति पहले नहीं, बल्कि दबाव पहले की अवधारणा पर आधारित थी। ग्रीनलैंड: बर्फ से ढका द्वीप, लेकिन भू-राजनीति का गर्म केंद्र रहा। साथियों बात अगर हम ग्रीनलैंड मुद्दे को समझने की करें तो यह भले ही जनसंख्या की दृष्टि से छोटा और भौगोलिक रूप से दूरस्थ क्षेत्र हो,लेकिन उसकी रणनीतिक अहमियत असाधारण है।यह दुनियाँ का सबसे बड़ा द्वीप है और आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण सैन्य,ऊर्जा, खनिज और वैश्विक व्यापार मार्गों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।जलवायु परिवर्तन और बर्फ के पिघलने के साथ आर्कटिक में नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जिससे यूरोप- एशिया-अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी कम हो सकती है। इसके साथ ही दुर्लभ खनिज, तेल और गैस जैसे संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है। यही कारण है कि ग्रीनलैंड अब केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक शक्ति-राजनीति का केंद्र बन चुका है। साथियों बात अगर कर हम अमेरिका की मंशा:आर्कटिक में वर्चस्व की होड़ को समझने की करें तो अमेरिका लंबे समय से ग्रीनलैंड में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। वहां पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और रडार सिस्टम इस बात का संकेत हैं कि वॉशिंगटन आर्कटिक को केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सामरिक युद्धक्षेत्र के रूप में देखता है।हालिया घटनाक्रम में अमेरिका ने ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य और रणनीतिक गतिविधियां तेज करने के संकेत दिए। आधिकारिक तर्क यह दिया गया कि रूस और चीन जैसी उभरती ताकतों को संतुलित करने के लिए यह जरूरी है। लेकिन यूरोप ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, क्योंकि यह संतुलन नहीं बल्कि प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश अधिक प्रतीत हुई। साथियों बात अगर हम टैरिफ हथियार:-कूटनीति की जगह आर्थिक धमकी इसको समझने की करें तो ग्रीनलैंड के मुद्दे पर विरोध बढ़ता देख ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर टैरिफ को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।घोषणा की गई कि 1 फरवरी से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड से अमेरिका भेजे जाने वाले सभी सामानों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा।यह कदम स्पष्ट रूप से राजनीतिक दबाव बनाने के लिए था, ताकि यूरोपीय देश अमेरिका के रुख का समर्थन करने को मजबूर हों। हालांकि, इस बार यह रणनीति उलटी पड़ती नजर आई।,यूरोपीय संसद के सबसे बड़े राजनीतिक समूह ईपीपी के प्रमुख मैनफ्रेड वेबर ने ट्रंप की धमकियों को गंभीरता से लिया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी दबाव और टैरिफ धमकियों से यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौतों की आत्मा पर सवाल खड़े हो गए हैं।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा हालात में अमेरिकी उत्पादों पर शून्य प्रतिशत टैरिफ की योजना को फिलहाल रोकना पड़ेगा। यह बयान इस बात का संकेत था कि यूरोप अब केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि प्रतिरोध की नीति अपनाने के लिए तैयार है। साथियों बात अगर हम प्लान होल्ड पर:ट्रंप को क्यों पीछे हटना पड़ा इसको समझने की करें तो,यूरोपीय देशों के संगठित विरोध और संभावित व्यापार युद्ध की आशंका के चलते ट्रंप प्रशासन को ग्रीनलैंड योजना फिलहाल होल्ड पर डालनी पड़ी। हालांकि उन्होंने 10 प्रतिशत टैरिफ के साथ जून तक की मोहलत दी, लेकिन यह साफ हो गया कि ग्रीनलैंड पर सीधा कब्जा या खुला दबाव डालना आसान नहीं होगा।यह पहला अवसर नहीं था जब ट्रंप को अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे कदम पीछे खींचने पड़े हों, लेकिन यह निश्चित रूप से सबसे प्रतीकात्मक उदाहरणों में से एक है। साथियों बात कर हम आर्कटिक राजनीति का भविष्य: टकराव या सहयोग? इसको समझने की करें तो ग्रीनलैंड विवाद ने आर्कटिक क्षेत्र की राजनीति को वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में आर्कटिक सहयोग का क्षेत्र बनेगा या टकराव का। यदि अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप अपने-अपने हितों के लिए इस क्षेत्र को युद्धभूमि में बदलते हैं, तो इसका असर पूरी वैश्विक व्यवस्था पर पड़ेगा।दूसरी ओर,यदि अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षीय संवाद और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जाती है, तो आर्कटिक वैश्विक सहयोग का नया मॉडल बन सकता है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल एक द्वीप तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संघर्ष का प्रतीक है जिसमें एक ओर एकध्रुवीय प्रभुत्व की सोच है और दूसरी ओर बहुध्रुवीय,नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मांग।यूरोप की एकता ने यह साबित किया है कि यदि देश सामूहिक रूप से खड़े हों, तो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र को भी पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। वहीं अमेरिका के लिए यह एक चेतावनी है कि इक्कीसवीं सदी में बल और दबाव की राजनीति अब बिना प्रतिरोध के स्वीकार नहीं की जाएगी। ग्रीनलैंड ने न केवल नाटो की अग्निपरीक्षा ली,बल्कि वैश्विक राजनीति को यह भी दिखा दिया कि भविष्य का विश्व संतुलन टैरिफ की धमकियों और कब्ज़े से नहीं बल्कि संवाद और सहयोग से ही संभव है। -संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425