चंडीगढ़/यूटर्न/15 जून। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के साथ प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा को सोमवार को रिपब्लिकन सहयोगियों का ज़बरदस्त समर्थन मिला, जबकि डेमोक्रेटिक सांसदों ने समझौते की शर्तों और अमेरिकी विदेश नीति पर इसके असर के बारे में और स्पष्टता की मांग की। रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति को समर्थकों से खूब तारीफ़ मिली, भले ही इस बात पर सवाल उठ रहे थे कि शुक्रवार को साइन होने वाले शुरुआती समझौता ज्ञापन (एमओयू) में कौन सी प्रतिबद्धताएं शामिल होंगी, और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे कौन से मुद्दे समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद ही बातचीत के लिए खोले जाएंगे। वरिष्ठ रिपब्लिकन नेताओं ने इस घोषणा को एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया। राष्ट्रपति के समर्थकों का तर्क था कि इस समझौते से पता चलता है कि ट्रंप लंबी सैन्य लड़ाई से बचते हुए ईरान से रियायतें हासिल करने में सक्षम हैं। कई सहयोगियों ने इस घटनाक्रम को इस बात का सबूत बताया कि प्रशासन की सैन्य दबाव और बातचीत की मिली-जुली रणनीति के अच्छे नतीजे निकले हैं।
डेमोक्रेट्स ने ज्यादा पारदर्शिता की मांग की
हालांकि, डेमोक्रेट्स ने ज़्यादा पारदर्शिता की मांग की और व्हाइट हाउस से आग्रह किया कि किसी भी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले कांग्रेस को जानकारी दी जाए। सांसदों ने सवाल उठाए कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाओं के बारे में क्या प्रतिबद्धताएं की गई हैं। आलोचकों का तर्क था कि समझौते की डिटेल जारी करने से पहले ही उसकी घोषणा कर देने से देश के भीतर और अमेरिकी सहयोगियों के बीच अनिश्चितता पैदा हो गई है।
संभावित समझौता महीनों की लड़ाई के बाद हुआ
इस बात पर भी सवाल बने हुए हैं कि प्रस्तावित समझौता ईरान के मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन और उसकी परमाणु गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी के भविष्य से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवादों को कैसे सुलझाएगा। विश्लेषकों ने गौर किया कि कई सबसे विवादास्पद मुद्दों को शुरुआती ढांचे में सुलझाने के बजाय भविष्य की बातचीत के लिए छोड़ दिया गया लगता है। यह संभावित समझौता महीनों की लड़ाई के बाद हुआ है, जिसने होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग को बाधित किया, वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को हिला दिया और व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का डर बढ़ा दिया।
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