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Hoshiarpur: बिस्त द्वाब नहर बनी खतरे का सबब, मरम्मत की मांग तेज - Uturn Time
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बिस्त द्वाब नहर की देखरेख में हो रही उपेक्षाएँ, नहर पुलों पर सुरक्षा का खत्म होना और चोरी हो रही सुरक्षा ग्रिलें लोगों के लिए जान का ख़तरा बनती जा रही हैं।
खोखला विकास और स्टाफ तथा बेलदारी की कमी ने नहर की हालत कर दी है खराब/ धीमान
होशियारपुर (दलजीत अज्नोहा) : दोआबा की धरती को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से लगभग 1952 में बनायी गयी बिस्त द्वाब नहर की हालत पिछले 74 वर्षों में सुधरने की बजाय बिगड़ती चली गयी है। यह नहर नवाँ शहर, हुशियारपुर, जलंधर और कपूरथला के किसानों को पानी पहुँचाती थी और मिट्टी के जल-स्तर को स्थिर रखने के लिए मजबूती से बनाई गयी थी। पिछले लगभग 60 वर्षों में जितनी मजबूती थी, वह बढ़ने की बजाय भ्रष्टाचार के कारण बहुत क्षतिग्रस्त हो गयी। यह नहर रोपड़ हेड वर्क्स और सतलुज नदी के एक किनारे से निकलती है। इस संबंध में लेबर पार्टी के प्रधान जय गोपाल धीमान, लहिंबर सिंह और जसविंदर कुमार ने नहर के प्रति हो रही उपेक्षाओं और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इन्हीं कारणों से नहर सुधारने की बजाय ख़राब हालत की ओर बढ़ी है। धीमान ने बताया कि यह नहर चार जिलों में कुल लगभग 1,55,085 हेक्टेयर एरिया को सिंचाई करती है। धीमान ने कहा कि जब नहर के आस-पास कच्ची सड़कें हुआ करती थीं तब नहर पर बेलदार (रख रखाव करने वाले) काम करते दिखाई देते थे और नहर को साफ-सुथरा रखते थे; वहां पेड़ों और झाड़ियों के झुंड कभी नहीं दिखते थे। नहर किनारे मिट्टी से बने सुरक्षा ढलान होते थे ताकि कोई व्यक्ति नहर में न गिरे। हर घाट, पुल पर रंग-बिरंगे चमकदार सुरक्षा ग्रिलें लगी होती थीं और हर जगह सुरक्षा व खतरे के संकेत बने होते थे। उस समय के ईमानदार और मेहनती अधिकारीयों ने बड़े परिश्रम से यह नहर बनाई और इसकी देखभाल की। नहर और उसके आस-पास अवैध कब्जे और गंदगी भी दिखते नहीं थे। उस समय के लोग अपने देश में बनने वाली चीज़ को प्यार करते थे और समझदारी से उसकी रक्षा करते थे। पर अब हम खोखले विकास के आदि हो गये हैं। धीमान ने बताया कि बहुत सुन्दर सफ़ाई वाले रेस्ट हाउस थे, पर धीरे-धीरे यह नहर भ्रष्ट लोगों के हाथों में चली गयी और सरकारों ने अपना मजबूत विरासत न संभालकर, बल्कि उसे अपनी जेबें भरने के लिए उजाड़ दिया। आज धीरे-धीरे नहर अपनी असली दशा खोती जा रही है। अब हालत ऐसी है कि नहर पर काम करने वाले बेलदार तो दिखाई नहीं देते, लगता है सरकारों ने नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी की जगह भ्रष्टाचार और झूठ को अपना लिया है। जिस कारण नहर के नवीनीकरण पर करोड़ों रुपये बर्बाद किये गये, जो आवश्यक भी नहीं थे। अब हालत यह है कि नहर के घाटों और पुलों पर लगे सुरक्षा ग्रिलें भ्रष्ट लोगों और चोरों की भेड़ चढ़ गयी हैं और कभी उन्हें रंग-रोगन करते नहीं देखा गया। जहां पुल बने हैं, उनके आसपास मिट्टी के बोरे रख कर समय बिताया जा रहा है, भले ही वहां कोई भी गिरकर अपनी जान न दे दे। नहर में पानी की सफाई की अहमियत अब राजनेताओं ने मिटा दी है। नहर के आसपास घना हरा-भरा जंगल था, झूठ और गपशप के विकास ने उस हरियाली को उजाड़ दिया और उसकी जगह जेब भरने के लिए अवैध कब्जों को करवा दिया। धीरे-धीरे उस हरियाली के उजाड़ने ने पूरे इलाके की सेहत पर असर डाला। नहर की पट्टियाँ और आस-पास पूरी तरह अवैध कब्जेदार राजनेताओं की शह पर कब्ज़ा करके बैठे हैं और यह सारा धंधा जेबें भरने के लिए चल रहा है। धीमान ने कहा कि अगर खोखले विकास की जड़ें इसी तरह फैलती रहीं तो देश को बहुत बड़ा नुकसान होगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि जागरूक हों और नहर को बचाने के लिए आगे आयें ।