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Panipat: गाँव गोयला खुर्द में धान की सीधी बिजाई तकनीक एवं संतुलित उर्वरक उपयोग पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित - Uturn Time
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किसान धान की सीधी बिजाई से उत्पादन लागत कम करके अधिक लाभ कमा सकते हैं: सतपाल सिंह
पानीपत (निर्मल सिंह विर्क): चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र उझा द्वारा दिनांक 12 मई 2026 को गाँव गोयला खुर्द में धान की सीधी बिजाई तकनीक तथा फसलों में संतुलित उर्वरकों के उपयोग विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) तकनीक के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करना था, ताकि किसान इस तकनीक को अपनाकर पानी की बचत करने के साथ-साथ अपनी आय में वृद्धि कर सकें। साथ ही संतुलित उर्वरकों के प्रयोग एवं मिट्टी परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन पर भी विस्तार से चर्चा की गई, जिससे किसान उत्पादन लागत कम कर अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त कर सकें। इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के संयोजक डॉ. सतपाल सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि धान की सीधी बिजाई तकनीक वर्तमान समय की एक अत्यंत उपयोगी एवं जल संरक्षण आधारित तकनीक है। इस तकनीक से लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इसके अतिरिक्त नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, श्रम एवं बिजली की बचत होती है तथा उत्पादन लागत भी रोपित धान की तुलना में कम आती है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि धान की सीधी बिजाई से पूर्व खेत का समतलीकरण अवश्य करवाएँ, क्योंकि समतल खेत में पानी की बचत होने के साथ-साथ अंकुरण अच्छा होता है तथा पौधों को पोषक तत्व भी बेहतर तरीके से प्राप्त होते हैं। उन्होंने बताया कि मध्यम से भारी बनावट वाली मिट्टी इस तकनीक के लिए उपयुक्त रहती है, जबकि हल्की एवं रेतीली मिट्टी में इसकी बिजाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी मिट्टी में विशेष रूप से लौह तत्व की कमी देखने को मिलती है। किसानों को धान की उपयुक्त किस्मों के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि किसान पूसा बासमती-1509, पूसा बासमती-1985 एच टी, पूसा बासमती-1847, एचकेआर-49, एचकेबी-22 आदि अल्पावधि किस्मों की बिजाई कर सकते हैं, जो लगभग 115 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। बीज उपचार के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि बीज उपचार न करने पर फसल में कई प्रकार की बीमारियों का प्रकोप बढ़ सकता है। किसानों को कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लिन द्वारा बीज उपचार की विधि विस्तार से बताई गई। उन्होंने बताया कि 10 लीटर पानी में 10 ग्राम कार्बेन्डाजिम एवं 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन मिलाकर घोल तैयार करें तथा उसमें 10 किलोग्राम धान के बीज को 12 घंटे तक उपचारित करें। बाद में बीज को छाया में सुखाकर बिजाई करें। खरपतवार प्रबंधन के संबंध में किसानों को बताया गया कि यदि आपने बत्तर अवस्था में बिजाई की है तो बिजाई के तुरंत बाद पेंडीमेथालीन (स्टॉम्प 30 ईसी) का प्रयोग 1300 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए । पोषक तत्व प्रबंधन पर चर्चा करते हुए किसानों को सलाह दी गई कि वे मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें। सामान्यतः बासमती वर्ग की किस्मों के लिए आधा कट्टा डीएपी, 50 किलोग्राम यूरिया तथा 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट (21 प्रतिशत) प्रति एकड़ पर्याप्त रहता है। यूरिया का प्रयोग दूसरे एवं चौथे-पाँचवें सप्ताह में करने की सलाह दी गई । डॉ. सतपाल सिंह ने बताया कि धान की सीधी बिजाई से प्राप्त उपज रोपित धान के बराबर रहती है, बशर्ते फसल प्रबंधन सही तरीके से किया जाए। उन्होंने किसानों से अधिक से अधिक क्षेत्र में धान की सीधी बिजाई अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि पानीपत जिले के कई ब्लॉक रेड जोन की श्रेणी में पहुँच चुके हैं तथा भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में यह तकनीक जल संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। साथ ही इस तकनीक से मिथेन गैस का उत्सर्जन भी कम होता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण में कमी आती है। कार्यक्रम में किसानों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग एवं जैविक कार्बन बढ़ाने के लिए हरी खाद के प्रयोग हेतु भी प्रेरित किया गया। किसानों से अपील की गई कि वे मिट्टी परीक्षण आधारित खेती अपनाएँ तथा जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग कर उत्पादन लागत कम करें और भूमि की उर्वरता बनाए रखें।कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. कुलदीप डूड़ी ने गर्मी के मौसम में पशुओं की देखभाल विषय पर किसानों को विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बढ़ते तापमान के दौरान पशुओं की विशेष देखभाल करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनके स्वास्थ्य एवं दूध उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि पशुओं को गर्मी से बचाने के लिए स्वच्छ एवं ठंडे पानी की पर्याप्त व्यवस्था करें तथा पशुओं को छायादार स्थान पर रखें। उन्होंने खनिज लवण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक पशु को नियमित रूप से खनिज मिश्रण अवश्य देना चाहिए, ताकि पशुओं में पोषक तत्वों की कमी न हो और उनकी उत्पादन क्षमता बनी रहे। इस अवसर पर उन्होंने हरे चारे के प्रबंधन पर भी विस्तार से चर्चा की तथा किसानों को संतुलित पशु आहार अपनाने के लिए प्रेरित किया। डॉ. कुलदीप डूड़ी ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा समय-समय पर पशुपालन एवं चारा प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनका लाभ किसानों को अवश्य उठाना चाहिए। उन्होंने किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र की विभिन्न गतिविधियों एवं योजनाओं की जानकारी देते हुए वैज्ञानिक खेती एवं पशुपालन तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम के अंत में किसानों को कृषि संबंधी अधिक जानकारी एवं प्रशिक्षण के लिए किसान ज्ञान केंद्र एवं कृषि विज्ञान केंद्र से निरंतर संपर्क बनाए रखने का आह्वान किया गया।