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नक्सलवाद फ्री इंडिया@2026 के बाद ड्रग फ्री इंडिया @2029: भारत की आंतरिक सुरक्षा, युवा भविष्य और वैश्विक जिम्मेदारी का निर्णायक चरण नार्को-टेरर-मिशन ड्रग फ्री इंडिया @2029:नशे के खिलाफ़ भारत की निर्णायक लड़ाई ड्रग फ्री इंडिया @2029 का लक्ष्य केवल एक सरकारी नारा नहीं बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों सामाजिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को सुरक्षित रखने की एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत ने पिछले एक दशक में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जिस प्रकार का निर्णायक बदलाव देखा है, वह न केवल राष्ट्रीय राजनीति बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समुदाय के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है। नक्सलवाद, जिसे लंबे समय तक भारत की सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना गया, उसके विरुद्ध 31 मार्च 2026 तक समाप्ति का लक्ष्य तय कर जिस तरह ठोस, बहु-स्तरीय और निरंतर अभियान चलाया गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत समन्वय और सुरक्षा बलों की पेशेवर क्षमता के साथ असंभव माने जाने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। इसी आत्मविश्वास के साथ भारत सरकार अब दूसरी, कहीं अधिक जटिल और वैश्विक जड़ों वाली चुनौती,ड्रग्स और नशा तस्करी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के चरण में प्रवेश कर चुकी है। ड्रग फ्री इंडिया @2029 का लक्ष्य केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों सामाजिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को सुरक्षित रखने की एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब प्रतिक्रियात्मक नीति से आगे बढ़कर समयबद्ध, परिणाम- आधारित और मिशन मोड में काम करने में सक्षम है।दशकों तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में समानांतर सत्ता,हिंसा,विकास अवरोध और मानवाधिकार संकट की स्थिति बनी रही। परंतु पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण, खुफिया तंत्र की मजबूती, स्थानीय विकास योजनाओं और राजनीतिक संकल्प ने इस चुनौती की कमर तोड़ दी। यही मॉडल अब ड्रग्स के खिलाफ़ अपनाने की तैयारी है लेकिन अंतर यह है कि नशा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बहुआयामी संकट है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा इसे नार्को- टेरर की संज्ञा देना इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है, क्योंकि ड्रग्स का पैसा आतंकवाद संगठित अपराध और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करता है।ड्रग फ्री इंडिया @2029 का लक्ष्य इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह पहली बार है जब भारत ने नशा मुक्त समाज की दिशा में एक स्पष्ट समय-सीमा, संस्थागत रोडमैप और बहु- विभागीय उत्तरदायित्व तय किया है। साथियों बात अगर हम नई दिल्ली में आयोजित एनकोर्ड की 9वीं उच्च स्तरीय बैठक को समझने की करें तो,यह इसी रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा हाइब्रिड मोड में आयोजित इस बैठक में केंद्र सरकार के मंत्रालयों,राज्य सरकारों और ड्रगकानून प्रवर्तन एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि यह लड़ाई किसी एक एजेंसी या राज्य की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है।बैठक का मुख्य उद्देश्य केवल आंकड़ों की समीक्षा नहीं, बल्कि नशा तस्करी नेटवर्क और गैंग को जड़ से तोड़ने, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और भविष्य की तकनीकी चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार करना था।ड्रग्स के खिलाफ इस नए अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका 360- डिग्री दृष्टिकोण है।पारंपरिक रूप से ड्रग्स को सीमा सुरक्षा या पुलिसिंग की समस्या के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब इसे एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में समझा जा रहा है, जहां उत्पादन,तस्करी,फाइनेंसिंग तकनीक उपभोक्ता मांग और सामाजिक कमजोरियां आपस में गहराई से जुड़ी हैं। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा सभी विभागों को 2029 तक का स्पष्ट रोडमैप और समयबद्ध निगरानी तंत्र तैयार करने का निर्देश इसी सोच को दर्शाता है। यह स्पष्ट किया गया है कि केवल ड्रग्स पकड़ना पर्याप्त नहीं,बल्कि पूरे नेटवर्क, किंगपिन,फाइनेंसर,लॉजिस्टिक्स हवाला चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म,को ध्वस्त करना लक्ष्य होना चाहिए।डार्कनेट क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल भुगतान जैसी नई तकनीकों ने ड्रग्स के व्यापार को पहले से कहीं अधिक जटिल बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग माफिया अब पारंपरिक तस्करी मार्गों के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं,जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इसी कारण एनकोर्ड बैठक में डार्कनेट और अवैध डिजिटल लेन-देन पर विशेष जोर दिया गया। यह संकेत है कि भारत की रणनीति केवल वर्तमान खतरों तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, साइबर फॉरेंसिक्स और वित्तीय खुफिया इकाइयों की भूमिका इस अभियान में निर्णायक होगी। साथियों बात अगर हम ड्रग्स की समस्या को समझने की करें तो, केंद्रीय गृह मंत्री ने सही ही कानून -व्यवस्था से अधिक नार्को-टेरर और आने वाली नस्लों को बर्बाद करने के षड्यंत्र के रूप में परिभाषित किया है।नशा केवल अपराध नहीं बढ़ाता,बल्कि युवाओं के स्वास्थ्य,मानसिक क्षमता, उत्पादकता और सामाजिक मूल्यों को भी नष्ट करता है। जब किसी देश की युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आती है,तो उसका सीधा असर आर्थिक विकास, नवाचार क्षमता और सामाजिक स्थिरता पर पड़ता है। भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह खतरा और भी गंभीर है। इसलिए ड्रग फ्री इंडिया @2029 का लक्ष्य वस्तुतः भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को सुरक्षित रखने की रणनीति भी है।31 मार्च 2026 के बाद शुरू होने वाला तीन वर्षीय सामूहिक अभियान इस रणनीति की रीढ़ होगा। इसमें नशे के खिलाफ सभी स्तंभों,कानून प्रवर्तन, खुफिया,वित्तीय जांच, सामाजिक जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाएं और पुनर्वास की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित की जाएगी। लक्षांक तय कर उनकी समयबद्ध समीक्षा होगी, ताकि यह अभियान केवल घोषणाओं तक सीमित न रह जाए। यह दृष्टिकोण नक्सलवाद केखिलाफ अपनाई गई रणनीति से मिलता- जुलता है, जहां नियमित समीक्षा और परिणाम-आधारित मूल्यांकन ने सफलता सुनिश्चित की। साथियों बात अगर हम ड्रग फ्री इंडिया अभियान का तीन सूत्रीय प्लान ऑफ एक्शन को समझने की करें तो इस पूरी रणनीति को व्यवहारिक आधार देता है।पहला सप्लाई चेन के खिलाफ सामूहिक और रूथलेस अप्रोच, अर्थात ड्रग्स के उत्पादन, तस्करी और वितरण के हर चरण पर बिना किसी नरमी के कार्रवाई। दूसरा, डिमांड रिडक्शन के लिए स्ट्रेटेजिक अप्रोच,यानी नशे की मांग को कम करने के लिए शिक्षा, जागरूकता, सामुदायिक भागीदारी और सामाजिक हस्तक्षेप। तीसरा, हार्म रिडक्शन के लिए ह्यूमन अप्रोच,जिसमें नशे के आदी लोगों को अपराधी नहीं, बल्कि उपचार और पुनर्वास की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाए। यह संतुलित दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप है और इसे भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है।ड्रग्स के व्यापार में किंगपिन, फाइनेंसर और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की भूमिका को केंद्र में लाना इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक शिफ्ट है। अतीत में अक्सर छोटे तस्करों या उपभोक्ताओं पर कार्रवाई तक सीमित रहकर बड़ी मछलियां बच निकलती थीं। अब स्पष्ट किया गया है कि समीक्षा का मुख्य मुद्दा यही होगा कि ड्रग्स के पीछे खड़े आर्थिक और संगठित ढांचे को कितना नुकसान पहुंचाया गया। हवाला और अवैध वित्तीय लेन-देन की जांच इसीलिए प्राथमिकता में है, क्योंकि पैसा ही ड्रग्स और आतंक के गठजोड़ को जीवित रखता है। साथियों बात अगर हम फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के बेहतर उपयोग और समय पर चार्जशीट दाखिल कर सजा की दर बढ़ाने पर दिया गया जोर को समझने की करें तो,यह दर्शाता है कि सरकार केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि न्यायिक परिणामों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। भारत में ड्रग्स मामलों में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे और कम सजा दर एक बड़ी चुनौती रही है। यदि जांच, फॉरेंसिक साक्ष्य और अभियोजन मजबूत हों, तो न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि निवारक प्रभाव भी पड़ेगा। टॉप-टू-बॉटम और बॉटम-टू-टॉप अप्रोच का उल्लेख इस बात का संकेत है कि पूरे नेटवर्क की जांच में किसी भी स्तर को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साथियों बात कर हम ड्रग्स के खिलाफ भारत की मौजूदा मुहिम के आंकड़े इस अभियान की गंभीरता और उपलब्धियों दोनों को दर्शाते हैं, इसको समझने की करें तो 2004 से 2013 के बीच जहां लगभग 40 हजार करोड़ रुपये मूल्य की 26 लाख किलोग्राम ड्रग्स जब्त की गई थी, वहीं 2014 से 2025 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 1 लाख 71 हजार करोड़ रुपये मूल्य की 1 करोड़ 11 लाख किलोग्राम तक पहुंच गया।यह केवल तस्करी में वृद्धि का संकेत नहीं, बल्कि कानून प्रवर्तन की क्षमता, खुफिया तंत्र और अंतर-एजेंसी समन्वय में आए व्यापक सुधार को भी दर्शाता है।सिंथेटिक ड्रग्स के खिलाफ अभियान को उत्साहजनक बताना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र भविष्य में सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है।ड्रग्स के डिस्पोज़ल में 11 गुना वृद्धि और अफीम की फसल नष्ट करने के आंकड़े भी इस अभियान की गहराई को दर्शाते हैं। 2020 में जहां 10,770 एकड़ भूमि पर अफीम की फसल नष्ट की गई थी, वहीं नवंबर 2025 तक यह आंकड़ा 40 हजार एकड़ तक पहुंच गया। यह संकेत है कि सरकार केवल तस्करी के अंतिम चरण पर नहीं, बल्कि स्रोत स्तर पर भी निर्णायक कार्रवाई कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग्स नियंत्रण में सोर्स कंट्रोल को सबसे प्रभावी रणनीतियों में माना जाता है, और भारत इस दिशा में स्पष्ट प्रगति कर रहा है। साथियों बात अगर हम ड्रग फ्री इंडिया@2029 का लक्ष्य वैश्विक संदर्भ में समझने की करें तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।दक्षिण एशिया दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के ड्रग्स रूट्स लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहे हैं। भारत का भौगोलिक स्थान इसे ट्रांजिट और टारगेट, दोनों के रूप में संवेदनशील बनाता है। यदि भारत इस चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव न केवल घरेलू सुरक्षा पर, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक ड्रग्स नियंत्रण प्रयासों पर भी पड़ेगा। यह भारत को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नीति निर्माण में एक मजबूत नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करेगा। भारतीय पीएम द्वारा 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी पर भारत को हर क्षेत्र में विश्व में अग्रणी बनाने का लक्ष्य तभी संभव है, जब युवा पीढ़ी स्वस्थ, सक्षम और नशामुक्त हो। ड्रग फ्री इंडिया अभियान इसी दीर्घकालिक दृष्टि का एक अनिवार्य हिस्सा है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा यह कहना कि अभी यह लड़ाई ऐसे मुकाम पर है कि हम इसे जीत सकते हैं,केवल आशावाद नहीं, बल्कि पिछले वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित आत्मविश्वास है।नक्सलवाद के खिलाफ सफलता ने यह विश्वास पैदा किया है कि यदि रणनीति स्पष्ट हो, संसाधन समर्पित हों और राजनीतिक इच्छाशक्ति अडिग हो,तो सबसे जटिल आंतरिकचुनौतियों से भी निपटा जा सकता है। अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अंततः, ड्रग फ्री इंडिया @2029 केवल सरकार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज, परिवार,शैक्षणिक संस्थानों,नागरिक संगठनों और मीडिया की सामूहिक जिम्मेदारी है।अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि नशे के खिलाफ लड़ाई तभी सफल होती है, जब कानून प्रवर्तन और सामाजिक जागरूकता एक-दूसरे के पूरक हों। भारत ने अब इस दिशा में स्पष्ट कदम बढ़ा दिया है। यदि घोषित रोडमैप, समयबद्ध समीक्षा और बहु-स्तरीय कार्रवाई ईमानदारी से लागू होती है, तो 2029 तक नशा मुक्त भारत का सपना केवल एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक वास्तविकता बन सकता है,जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वस्थ और सशक्त भविष्य की नींव रखेगा। *-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425*