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एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र गोंदिया— 3 जनवरी 2026 की रात वैश्विक राजनीति के इतिहास में एक असाधारण और विवादास्पद मोड़ लेकर आई। अमेरिका ने “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रेज़ॉल्व” के अंतर्गत वेनेज़ुएला की राजधानी काराकस सहित कई रणनीतिक ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलीया फ्लोरेस को हिरासत में ले लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस कार्रवाई की सार्वजनिक पुष्टि के साथ ही पूरी दुनिया में राजनीतिक, कूटनीतिक और कानूनी हलचल तेज़ हो गई। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि मादुरो पर नार्को-टेररिज़्म, कोकीन तस्करी, अंतरराष्ट्रीय साज़िश और अमेरिका के विरुद्ध सुरक्षा खतरे जैसे गंभीर आरोप हैं, जिनके आधार पर उन्हें न्यूयॉर्क के दक्षिणी ज़िले की संघीय अदालत में मुक़दमे का सामना करना होगा। अमेरिका इसे कानून के शासन और वैश्विक सुरक्षा के संरक्षण की कार्रवाई बता रहा है। वहीं मादुरो सरकार और उनके समर्थक इन आरोपों को पूरी तरह राजनीति-प्रेरित बताते रहे हैं। पुराना तनाव, नया विस्फोट अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। 1976 में वेनेज़ुएला द्वारा अपने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद से दोनों देशों के संबंध लगातार टकराव की दिशा में बढ़ते रहे। वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार, समाजवादी नीतियाँ और अमेरिकी प्रभाव से दूरी—ये सभी कारण इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में दशकों से मौजूद रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ और वैश्विक चिंता इस सैन्य कार्रवाई के बाद रूस, ईरान और क्यूबा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे संप्रभुता का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ आक्रामक कृत्य बताया। रूस ने इसे वैश्विक व्यवस्था के लिए ख़तरनाक मिसाल कहा, जबकि ईरान और क्यूबा ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील की। यूरोपीय संघ ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाते हुए न तो खुला समर्थन दिया और न ही सीधी निंदा, बल्कि तथ्यों की पुष्टि और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की बात कही। यह रुख स्वयं में संकेत देता है कि वैश्विक शक्तियाँ इस घटना को एक कानूनी और नैतिक परीक्षा के रूप में देख रही हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता पर प्रश्न संयुक्त राष्ट्र चार्टर की धारा 2(4) स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी भी राज्य के विरुद्ध बल प्रयोग केवल आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद की अनुमति से ही किया जा सकता है। किसी संप्रभु राष्ट्र के मौजूदा राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई के ज़रिये पकड़कर विदेश ले जाना—अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांतों से टकराता प्रतीत होता है। कई अंतरराष्ट्रीय विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की कार्रवाइयों को वैध ठहराया गया, तो यह भविष्य में अन्य देशों के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं के खिलाफ भी खतरनाक नज़ीर (precedent) बन सकता है, जिससे वैश्विक व्यवस्था अस्थिर हो सकती है। मानवाधिकार बनाम सुरक्षा तर्क मानवाधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को अस्पष्ट, अपारदर्शी और नागरिक अधिकारों के लिए जोखिमपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि बिना अंतरराष्ट्रीय सहमति और स्वतंत्र जांच के इस तरह की सैन्य कार्रवाई वैश्विक मानवाधिकार ढांचे को कमजोर करती है। अमेरिका इसे नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम बताता है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे तेल संसाधनों और भू-आर्थिक हितों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। क्या तीसरे विश्व युद्ध की आहट है? इस प्रश्न ने वैश्विक विमर्श को झकझोर दिया है। विशेषज्ञों की राय में फिलहाल इसे तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत कहना अतिशयोक्ति होगी। ऐसा संघर्ष तभी माना जाएगा जब परमाणु-सक्षम शक्तियाँ प्रत्यक्ष सैन्य गठबंधनों के साथ आमने-सामने उतरें। हालांकि, यह घटना वैश्विक तनाव को निश्चित रूप से बढ़ाती है और यदि संवाद के रास्ते बंद हुए, तो जोखिम गंभीर हो सकता है।