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पावर टू सेव ह्यूमन राइट्स के प्रधान इंजीनियर परमजीत सिंह भारज द्वारा केंद्र सरकार के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को, डिप्टी कमिश्नर लुधियाना के माध्यम से, एक गंभीर शिकायत जनहित में भेजी गई है। इस शिकायत में देश के करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं के साथ हो रही नाइंसाफी और उनके कानूनी अधिकारों के उल्लंघन की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। प्रेस को जारी बयान में उन्होंने कहा कि देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनियां जैसे जियो, एयरटेल और वोडाफोन आइडिया द्वारा 5G और उच्च गति वाली इंटरनेट सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करके उपभोक्ताओं से महंगी राशि वसूली जा रही है, लेकिन वास्तविकता में न तो उन्हें वादे के अनुसार स्पीड मिल रही है और न ही मानक के अनुरूप सेवा प्रदान की जा रही है। उन्होंने बताया कि बिना पर्याप्त टावर और नेटवर्क क्षमता के नए सिम कार्ड और कनेक्शन जारी करना सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है, जिससे एक ही टावर पर अत्यधिक भार पड़ जाता है और इंटरनेट की गति बहुत कम हो जाती है। उपभोक्ताओं द्वारा की गई शिकायतों पर कंपनियों की ओर से हमेशा एक ही जवाब दिया जाता है कि “ज्यादा यूजर होने के कारण स्पीड कम है और अपग्रेडेशन का काम चल रहा है”, जो कि वर्षों से दोहराया जा रहा है। यह व्यवहार स्पष्ट रूप से गलत प्रस्तुति की श्रेणी में आता है। इंजीनियर भारज ने कहा कि यह मामला भारत के कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत सेवा में आता है। इसके अलावा, टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट, 1997 के अनुसार टेलीकॉम सेवाओं की गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना अनिवार्य है। उपभोक्ताओं को वादे के अनुसार सेवा न देना एक कानूनी उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि सूचना का अधिकार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आधुनिक युग में एक बुनियादी आवश्यकता बन चुकी है, और कम गुणवत्ता वाली सेवा के बावजूद पूरी राशि वसूलना नैतिक और कानूनी दोनों ही दृष्टि से गलत है। संस्था ने मांग की है कि प्रत्येक क्षेत्र के लिए टेलीकॉम कंपनियों की अधिकतम उपभोक्ता सीमा कानूनी रूप से निर्धारित की जाए। जब तक पूरा नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार न हो, तब तक उस क्षेत्र में नए सिम और प्लान की बिक्री पर रोक लगाई जाए। 5G सेवाओं के लिए न्यूनतम कानूनी स्पीड मानक तय किया जाए। अंत में इंजीनियर परमजीत सिंह भारज ने भावुक अपील करते हुए कहा कि आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से सेवाएं खरीदता है और उसे बदले में न्यायपूर्ण और मानक के अनुरूप सेवा मिलनी चाहिए। यदि इस मामले पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो संस्था अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होगी।