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PGI रिसर्च में बड़ा खुलासा: बार-बार गर्भपात के पीछे जेनेटिक कारण, 91 जीन की पहचान - Uturn Time
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चंडीगढ़/यूटर्न/27 मार्च। बार-बार गर्भपात की समस्या से जूझ रही महिलाओं के लिए एक अहम वैज्ञानिक सफलता सामने आई है। पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की टीम ने अपने शोध में इस समस्या के पीछे छिपे जेनेटिक कारणों को उजागर किया है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 91 जीन की पहचान की है, जिनमें से 10 ‘हब जीन’ को सबसे अधिक प्रभावशाली पाया गया। ये जीन गर्भधारण और भ्रूण के स्थायित्व में अहम भूमिका निभाते हैं। शोध के लिए आधुनिक ट्रांसक्रिप्टोमिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे गर्भ से जुड़े टिश्यू के जीन का विस्तृत विश्लेषण संभव हो सका। क्या है ‘रिकरेंट प्रेग्नेंसी लॉस’? चिकित्सकीय भाषा में, जब किसी महिला को दो या उससे अधिक बार गर्भपात हो, तो उसे रिकरंट प्रेगनेंसी लॉस कहा जाता है। अब तक कई मामलों में इसके स्पष्ट कारण सामने नहीं आ पाते थे, जिससे इलाज चुनौतीपूर्ण हो जाता था। जीन कैसे बनते हैं वजह? शोध में पाया गया कि शरीर के जीन विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। यदि इन जीन में गड़बड़ी आती है, तो इसका सीधा असर गर्भधारण और भ्रूण के विकास पर पड़ता है। पहचाने गए प्रमुख जीन खासतौर पर इन प्रक्रियाओं से जुड़े हैं: इम्यून सिस्टम (रोग-प्रतिरोधक क्षमता),सूजन (इन्फ्लेमेशन),रक्त वाहिकाओं का विकास इनमें असंतुलन होने पर गर्भ ठहरने के बाद भी वह टिक नहीं पाता, जिससे गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। भविष्य के इलाज की दिशा यह शोध चिता भारद्वाज और प्रियंका श्रीवास्तव की टीम द्वारा किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस खोज से आने वाले समय में: गर्भपात के कारणों की शुरुआती पहचान संभव होगी,जीन आधारित सटीक इलाज विकसित किए जा सकेंगे,इन जीन को बायोमार्कर के रूप में उपयोग किया जा सकेगा | क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक कई महिलाएं बिना स्पष्ट कारण के बार-बार गर्भपात का सामना करती थीं, जिससे मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ता था। पीजीआई का यह शोध इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जो भविष्य में बेहतर उपचार और नई उम्मीद का रास्ता खोल सकता है।