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अस्पतालों की लूट : अपनी दवाइयां अपने दाम, मरीज हैं या 'बलि का बकरा - Uturn Time
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लुधियाना/ यूटर्न/21 मार्च।बावजूद दर्जनों सरकारी दावों के सरकारी अस्पताल अभी भी कॉर्पोरेट अस्पतालों से कोसो दूर है निजी अस्पतालों व क्लिनिकों में उपचार पहले भी काफी महंगा है सरकारी अस्पतालों में सरकारी दावों के बावजूद व्यापक सुधार होने बाकी हैं। ऐसे में निजी अस्पतालों विशेष कर कॉरपोरेट अस्पतालों में उपचार के दाम काफी अधिक है और सरकार का इन पर कोई नियंत्रण नहीं है रही बात दवाइयां की तो अब अस्पतालों ने अपने ब्रांड नाम रखकर दवाइयां बनवाने शुरू कर दी हैं और उसे पर दम भी अपनी मर्जी से प्रिंट कराये जा रहे हैं अस्पतालों में उपचार लंबा होने लगा है अस्पतालों के टारगेट से महंगा हुआ उपचार मरीज लाचार कॉरपोरेटर निजी अस्पतालों के निर्धारित टारगेट के चलते डॉक्टर पर उसे पूरा करने के लिए दबाब बनाया जाता है ऐसे में उपचार पहले से कई गुना महंगा हो गया है और मरीज लाचारी की हालत में डॉक्टर का मुंह देखता रहता है ओपीडी में आने वाले मरीजों में से लगभग 20 प्रतिशत को अस्पताल में ज्यादा नहीं एक-दो दिन भर्ती होने का मशवरा दिया जाता है भर्ती होने पर अस्पताल में रहने की अवधि बढ़ा दी जाती है ड्रग प्राइस कंट्रोल की कैसे उड़ाते हैं धज्जियां ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर जिन में जीवन रक्षक दवाइयां शामिल हैं, के दाम सरकार द्वारा निर्धारित किए गए हैं। यह ऐसी दवाइयां है जो सबसे अधिक इस्तेमाल होती हैं। इनमें निधर्धारित दामों से अधिक न ती कोई ले सकता है न हीं इसके प्रिंट रेट से छेड़छाड़ की जा सकती है। इन सबसे बचने के लिए डॉक्टर निर्धारित निर्धारित दवाइयों के साथ लिखने की बजाय नए मॉलिक्यूल लिख रहे हैं। इसके अलावा कंपनियों ने नए प्रोडक्ट लांच कर दिए हैं जिनमें नए‌ कांबिनेशन शामिल कर उसे प्रमोट किया जाता है। अपने मॉलेक्यूलिस और नए कांविनेशन की दवाइयां को अस्पताल तथा अच्छी प्रैक्टिस चाले निजी कलीनिक अपने नाम से बनवा रहे हैं. और उसके प्रिंट रेट भी अपनी मर्जी से निर्धारित करते हैं।यह दवाइयां डॉक्टर के कलीनिक से ही मिलती हैं जबकि बाहर कैमिस्ट शॉप से यह दवाइयां नहीं मिलती हैं। सरकार द्वारा भी कोई रोक नहीं लगाई जा रही है। दवाइयों और टैस्टों पर लाभ प्रतिशत निर्धारित हो लोगों का कहना है कि सरकार की चाहिए कि दवाइयों और लैब टैस्टों पर दाम निर्धारित किए जाने चाहिए जैसे ही कोई दवा फैक्टरी से निकलती है तो उस पर लाभ प्रतिशत फिक्स कर दिया जाना चाहिए। इसी तरह लैब और डायग्नॉस्टिक टैस्टों के दाम भी निर्धारित होने चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार 45 प्रतिशत सर्जरी फेक होती है 2016 से लेकर 2025 तक हालत पहले से बदतर हो गए हैं जबकि 2016 में की रिपोर्ट के अनुसार 44 प्रतिशत सर्जरी फैक होती है जिनकी कोई आवश्यकता नहीं होती है। इनमें से 55 प्रतिशत दिल की सर्जरी, 48 प्रतिशत यूट्रस सर्जरी, 47 प्रतिशत कैंसर, 48 प्रतिशत घुटना प्रतिरोपण तथा 45 प्रतिशत से अधिक सिजेरियन सैक्शन सर्जरी बताई जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पार्लियामेंट्री कमेटी इस बात को मान चुकी है कि अपने टारगेट और प्रॉफिट दिखाने के चक्कर में कॉर्परिट अस्पताल फैक सर्जरी करते हैं और उनके साथ देने वाले डॉक्टरों की सैलरी लाखों रुपए में होती है। जी डॉक्टर अपने टारगेट पूरे नहीं करता या ऐसे कामों में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाता तो उसे कॉर्पोरेट अस्पताल से चलता कर दिया जाता है । डायग्नोस्टिक व लैब टैस्ट के रेट नहीं किए निर्धारित सरकार द्वारा अभी तक डायग्नोस्टिक तथा लैब टैस्टों के रेट निर्धारित नहीं किए गए हैं। ऐसे में कोई अस्पताल अथवा डायग्नॉस्टिक सैंटर ज्यादा दाम वसूल कर रहा है तो कोई कम। इसी तरह लैब टैस्टों में भी देखा जा रहा है। ईमानदारी से काम करने वाले डॉक्टर हुए कम ऐसा नहीं कि चिकिला पैसे से जुड़े सभी डॉक्टर पैसे कमाने के लिए मरीजों का खून दूरस्ते हैं बल्कि बहुत से ऐसे डॉक्टर है जो आज भी ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं और पैसे की बजाय मरीज को ठीक करने में अधिक ध्यान देते हैं। छोटे अस्पताल व क्लीनिक भी अब पीछे नहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि कॉर्परिट अस्पतालों ने ही उपचार महंगा नहीं किया बल्कि कई छोटे अस्पताल और नर्सिंग होम भी मरीजों को लूटने में पीछे नहीं थे। इनमें से अधिकतर अस्पतालों के अपने डुग स्टोर है और उससे भी आगे बात करें तो कइयों ने भी अपने मुताबिक बनवा ली है। दिखावे के तौर पर कभी कभार डॉक्टर दवाइयों से 5-10 प्रतिशत डिस्काउंट दे देते हैं ताकि मरीज भी खुश रहे और उनका काम भी चलता रहे जबकि बाजार में वहीं दवाइयां काफी कम दामों पर उपलब्ध हती है। गरीबों की जगह उच्च अधिकारियों का उपचार होता है मुफ्त कॉर्पोरेट तथा निजी अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए आरक्षित बिस्तर रखने के निर्देशों के बावजूद अधिकतर अस्पताल इस और ध्यान नहीं देते बल्कि उनके अस्पताल में अगर कोई सरकार का उच्च अधिकारी या उसका रिश्तेदार भरती होता है तो उसका उपचार निशुल्क कर दिया जाता है और उससे कोई पैसे नहीं लिए जाते ताकि आडे वक्त में वह उनके काम आ सके