चंडीगढ़/ यूटर्न/20 मार्च।पंजाब की सहकारी समितियों से जुड़े कर्मचारियों को बड़ा झटका देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 1997 के सेवा नियमों को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन नियमों के आधार पर ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और अन्य रिटायरमेंट लाभों का दावा नहीं किया जा सकता।
यह अहम फैसला जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए सुनाया। इनमें सेवानिवृत्त कर्मचारियों की याचिकाएं भी शामिल थीं, जिनमें बकाया लाभ और ब्याज की मांग की गई थी।
‘सब-डेलीगेशन’ को बताया अवैध
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पंजाब कोआपरेटिव सोसाइटीज एक्ट , 1961 के तहत सेवा नियम बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है। 1963 के नियमों के जरिए यह शक्ति रजिस्ट्रार को सौंप दी गई थी, जिसके आधार पर 1997 के सेवा नियम बनाए गए। कोर्ट ने इसे ‘सब-डेलीगेशन’ करार देते हुए कानून के विरुद्ध बताया।
नियमों को वैधानिक मान्यता नहीं
कोर्ट ने कहा कि 1997 के सेवा नियम न तो वैधानिक हैं और न ही इन्हें विधानसभा के समक्ष पेश किया गया। ऐसे में इन नियमों के आधार पर कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता और न ही इन्हें लागू कराने के लिए अदालत का सहारा लिया जा सकता है।
सहकारी समितियां स्वतंत्र संस्थाएं
फैसले में अदालत ने कहा कि सहकारी समितियां स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जो अपने संसाधनों से कर्मचारियों का वेतन और अन्य खर्च उठाती हैं। राज्य सरकार इनकी वित्तीय जिम्मेदारी नहीं लेती, इसलिए इन पर सरकारी कर्मचारियों जैसे वेतन और रिटायरमेंट लाभ का बोझ डालना व्यावहारिक नहीं है।
आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी
कोर्ट ने माना कि अधिकांश सहकारी समितियां आर्थिक संकट से जूझ रही हैं और कई के पास कर्मचारियों का नियमित वेतन देने तक के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। ऐसे में भारी-भरकम रिटायर लाभ देना संभव नहीं है।
याचिकाएं खारिज, समिति को राहत
अदालत ने कर्मचारियों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि एक सहकारी समिति की याचिका को स्वीकार करते हुए अधिकारियों द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया गया कि समिति को जबरन भुगतान के लिए बाध्य न किया जाए।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले से दिए गए रिटायरमेंट लाभों की कोई वसूली नहीं की जाएगी।