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पांच राज्यों में चुनावी बिगुल- चुनाव का पर्व:हम सबका गर्व- क्षेत्रीय दल बनाम राष्ट्रीय दल: सियासी संघर्ष- भारतीय लोकतंत्र के महाकुंभ का व्यापक विश्लेषण - Uturn Time
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चुनावी महाकुंभ- दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र जब चुनावी प्रक्रिया से गुजरता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों की शक्ति का प्रतीक बन जाता है। पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे केवल इन राज्यों की सरकारों को तय नहीं करेंगे बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा को भी प्रभावित कर सकते हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में एक बार फिर चुनावी महापर्व का शंखनाद हो चुका है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यही है कि सत्ता का निर्धारण जनता के मत से होता है और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। इसी कड़ी में भारतीय चुनाव आयोग ने पांच महत्वपूर्ण राज्यों पश्चिम बंगाल तमिलनाडु,असम केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभा चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी है। इन चुनावों को केवल पांच राज्यों की सत्ता की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय राजनीति,भविष्य की रणनीति और लोकतांत्रिक परिपक्वता का एक बड़ा संकेतक भी साबित होने जा रहा है। चुनाव आयोग द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनावी कार्यक्रम का विस्तृत ब्यौरा जारी किया गया, जिसके साथ ही पूरे देश में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।घोषित कार्यक्रम के अनुसार पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान 23 और 29 अप्रैल को होगा,जबकि मतगणना 4 मई को होगी। तमिलनाडु में एक ही चरण में 23 अप्रैल को मतदान और 4 मई को परिणाम घोषित होंगे।असम,केरल औरपुडुचेरी में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान कराया जाएगा और इन राज्यों के परिणाम भी 4 मई को सामने आएंगे। यह चुनाव कार्यक्रम इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सभी राज्यों के नतीजे एक ही दिन घोषित होंगे, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में एक साथ बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।चुनाव आयोग के अनुसार इस बार लगभग 7.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे और लगभग 2.18 लाख मतदान केंद्र बनाए गए हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में ही 80 हजार से अधिक मतदान केंद्र स्थापित किए गए हैं। यह आंकड़े भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की विशालता को दर्शाते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत में होने वाले चुनाव केवल राष्ट्रीय घटना नहीं होते बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें भी इन पर टिकी रहती हैं। दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र जब चुनावी प्रक्रिया से गुजरता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों की शक्ति का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि इन पांच राज्यों के चुनावों को एक प्रकार से चुनावी महाकुंभ कहा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे केवल इन राज्यों की सरकारों को तय नहीं करेंगे बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा को भी प्रभावित कर सकते हैं। साथियों बात अगर हम क्षेत्रीय दल बनाम राष्ट्रीय दल: सियासी संघर्ष इस विशेष पहलू को समझने की करें तो इन चुनावों का सबसे बड़ा पहलू यह है कि तीनमहत्वपूर्ण राज्यों,पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में लंबे समय से क्षेत्रीय दलों का मजबूत वर्चस्व रहा है।इन राज्यों में राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ पार्टी अभी तक सत्ता में नहीं आ सकी है। इसके विपरीत असम में बीजेपी सत्ता में है और वह तीसरी बार सत्ता में लौटने कीकोशिश कर रही है, जबकि पुडुचेरी में भी वह दूसरी बार सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।इस प्रकार यह चुनावक्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों और राष्ट्रीय दलों के बीच शक्ति संतुलन की परीक्षा भी माना जा रहा है। साथियों बात अगर हम पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अग्निपरीक्षा को समझने की करें तो,पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार सबसे अधिक चर्चा में है।राज्य की राजनीति पिछले डेढ़ दशक से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2011 से लगातार सत्ता में रहने के कारण इस बार उनके सामने सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है।यदि ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल होती हैं तो यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।दूसरी ओर बीजेपी राज्य में सोनार बांग्ला के नारे के साथ अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के शीर्ष नेताओं का मानना है कि हिंदुत्व, विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों के आधार पर वह राज्य में मजबूत चुनौती पेश कर सकती है।पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं। पिछले चुनाव में टीएमसी ने 213 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि बीजेपी को 77 सीटें मिली थीं।कांग्रेस और वामपंथी दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था।यही कारण है कि इस बार चुनावी गणित काफी दिलचस्प बन गया है। भाजपा की रणनीति यह है कि कांग्रेस और वाम दलों के कमजोर होने से जो वोट बैंक खाली हुआ है, उसे अपने पक्ष में किया जाए। वहीं टीएमसी अपनी कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत संगठन के आधार पर सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है। साथियों बात अगर हम असम: सत्ता बरकरार रखने की चुनौती को समझने की करें तो,असम में राजनीतिक समीकरण कुछ अलग हैं। यहां बीजेपी पहले से ही सत्ता में है और तीसरी बार सरकार बनाने के लिए प्रयासरत है।राज्य में कुल 126 विधानसभा सीटें हैं और पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने अपने संगठन को काफी मजबूत किया है। हालांकि विपक्षी दल भी गठबंधन के जरिए चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। असम का चुनाव इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की राजनीतिक पकड़ का यह एक बड़ा केंद्र बन चुका है।केरल वैचारिक राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र। साथियों बात अगर हम केरल भारतीय राजनीति का एक अनूठा उदाहरण है इसको समझने की करें तो यहाँ सत्ता अक्सर दो बड़े गठबंधनों के बीच बदलती रहती है। राज्य की राजनीति में वामपंथी दलों और कांग्रेस केनेतृत्व वाले गठबंधन का प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है। यहां भाजपा अभी तक सत्ता के करीब नहीं पहुंच सकी है। 140 सीटों वाली केरल विधानसभा में इस बार भी मुख्य मुकाबला पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवों के बीच ही देखने को मिल सकता है। हालांकि भाजपा अपने संगठन के विस्तार के माध्यम से यहां धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। साथियों बात कर हम तमिलनाडु त्रिकोणीय मुकाबले कीसंभावना को समझने की करें तो, तमिलनाडु का चुनाव इस बार बेहद रोचक माना जा रहा है। यहां 234 सीटों वाली विधानसभा में मुख्य मुकाबला परंपरागत रूप से द्रविदा मुन्नेत्र कज़हगाम और आल इंडिया अन्ना द्रविदा मुन्नेत्र कज़हगाम के बीच होता रहा है। वर्तमान में स्टालीन के नेतृत्व में डीएमके सत्ता में है और वह अपनी सरकार को बनाए रखने के लिए प्रयासरत है। लेकिन इस बार राजनीतिक समीकरण इसलिए भी बदल गए हैं क्योंकि प्रसिद्ध अभिनेता विजय ने अपनी पार्टी तमिलेगा वैटरी कज़हगाम बनाकर राजनीति में प्रवेश कर लिया है।अभिनेता विजय की राजनीति और संभावित गठबंधन तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता विजय का प्रवेश चुनावी समीकरणों को काफी हद तक बदल सकता है। उनके प्रशंसकों की संख्या बहुत अधिक है और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उनका वोट बैंक किसी भी गठबंधन के साथ जाता है तो वह कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकता है। सूत्रों के अनुसार भाजपा विजय की पार्टी को अपने गठबंधन में शामिल करने की कोशिश कर रही है और उन्हें उपमुख्यमंत्री पद सहित कई आकर्षक प्रस्ताव भी दिए जा सकते हैं। यदि यह गठबंधन सफल होता है तो तमिलनाडु की राजनीति में एक सटीक नया अध्याय शुरू हो सकता है। साथियों बात अगर हम पुडुचेरी छोटे राज्य में बड़ी लड़ाई इसको समझने की करें तो 30 सीटों वाली पुडुचेरी विधानसभा का चुनाव भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है। यहां राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है। इस बार भी सत्ता में वापसी के लिए कई दल सक्रिय रणनीति बना रहे हैं। छोटे राज्यों के चुनाव अक्सर बड़ेराजनीतिक संकेत देते हैं और पुडुचेरी का चुनाव भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है। साथियों बात अगर हम मतदाता और लोकतांत्रिक सहभागिता इसको समझने की करें तो,इस चुनाव में लगभग 7.4 करोड़ मतदाता भाग लेंगे,जो भारत की लोकतांत्रिक शक्ति का प्रमाण है। चुनाव आयोग ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदान में भाग लें और अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करेंलोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक सक्रिय रूप से चुनावी प्रक्रिया में भाग लेते हैं।यही कारण है कि चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चलाता रहा है इस चुनाव में मतदाता सूची को लेकर भी कुछ विवाद सामने आए हैं। एसआईआर प्रक्रिया के अंतर्गत लाखों वोट हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं, जिस पर कई राजनीतिक दलों ने चिंता व्यक्त की है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को पारदर्शी और अद्यतन बनाने के लिए यह प्रक्रिया आवश्यक है। साथियों बात कर हम राजनीतिक रणनीतियां और चुनावी मुद्दे इसको समझने की करें तो हर चुनाव की तरह इस बार भी विभिन्न दल अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान में उतर रहे हैं।कहीं विकास और कल्याणकारी योजनाओं को मुद्दा बनाया जा रहा है तो कहीं पहचान की राजनीति और क्षेत्रीय अस्मिता को।पश्चिम बंगाल में नागरिकता और पहचान से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं, जबकि तमिलनाडु में क्षेत्रीय गौरव और सामाजिक न्याय की राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। केरल में वैचारिक राजनीति और विकास मॉडल प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं, जबकि असम में राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास की राजनीति प्रमुखसटीकविषय बन सकती है। साथियों बात अगर हम चुनाव और राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव को समझने की करें तो इन पांच राज्यों के चुनावी परिणाम केवल राज्य सरकारों को ही निर्धारित नहीं करेंगे बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि राष्ट्रीय दल इन राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल होते हैं तो आने वाले वर्षों में उनकी रणनीति और भी आक्रामक हो सकती है। वहीं यदि क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बनाए रखते हैं तो यह भारतीय राजनीति में संघीय ढांचे की मजबूती का संकेत होगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि लोकतंत्र की शक्ति और जनता का निर्णय,लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। राजनीतिक दल चाहे कितनी भी रणनीति बनाएं,अंतिम फैसला मतदाता ही करते हैं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां सत्ता का स्रोत जनता है। आने वाले चुनावों में भी यही सिद्धांत लागू होगा।4 मई को जब मतगणना के बाद परिणाम सामने आएंगे, तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किसे सत्ता सौंपी है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल पांच राज्यों की सत्ता का संघर्ष नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की शक्ति, विविधता और जीवंतता का एक और भव्य उदाहरण साबित होगा। -संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र