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11वां रायसीना डायलॉग नई दिल्ली 5-7 मार्च 2026-मिडिल ईस्ट में भयंकर युद्ध की आग के बीच कूटनीति का महाकुंभ - वैश्विक शक्ति के रूप में उभरता भारत - Uturn Time
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युद्ध की पृष्ठभूमि में आयोजित यह सम्मेलन दर्शाता है कि नई दिल्ली केवल घटनाओं की प्रतिक्रियात्मक दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय एजेंडा-निर्माता है। रायसीना डायलॉग 2026 क़ी थीम संस्कार: दृढ़ता, सामंजस्य, प्रगति,अपने आप में समय की मांग का दार्शनिक उत्तर है,दृढ़ता उस क्षमता की ओर संकेत करती है जो देशों को युद्ध, महामारी,आर्थिक झटकों और तकनीकी व्यवधानों के बीच टिके रहने की शक्ति देती है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर मध्य पूर्व में युद्ध की आंच तेज है।ईरान और अमेरिका-इज़रायल के बीच हालिया सैन्य टकराव ने खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है,ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं,और महाशक्तियों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो रही है। ऐसे समय में जब दुनियाँ के कई बड़े देश युद्ध,प्रतिबंधों,आर्थिक सुस्ती और आंतरिक राजनीतिक संकटों से जूझ रहे हैं, भारत की राजधानी नई दिल्ली 5 से 7 मार्च 2026 के बीच एक अलग ही संदेश दे रही है संवाद,संतुलन औररणनीतिक विवेक का संदेश। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि 11वां रायसीना डायलॉग ऐसे वैश्विक संदर्भ में आयोजित हो रहा है,जब बहुध्रुवीय विश्व- व्यवस्था की रूपरेखा पुनःलिखी जा रही है। यह सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की उस बढ़ती भूमिका का प्रतीक है जिसमें वह संघर्षों के बीच संवाद का मंच, प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन का केंद्र और अनिश्चितता के बीच नीति-निर्माण का प्रयोगशाला बनकर उभर रहा है।रायसीना डायलॉग का आयोजन हर वर्ष भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में होता है। 2016 में इसकी शुरुआत हुई थी,और एक दशक के भीतर यह एशिया का प्रमुख भू- राजनीतिक और भू- अर्थव्यवस्था सम्मेलन बन चुका है। रायसीना नाम स्वयं भारत की सत्ता-धुरी का प्रतीक है राइसीना हिल्स वह पहाड़ी जहां राष्ट्रपति भवन और प्रमुख मंत्रालय स्थित हैं। नाम में ही निहित है कि यह सम्मेलन सत्ता, रणनीति और संप्रभुता के उस केंद्र से संचालित होता है जहां से भारत अपनी वैश्विक दृष्टि का संप्रेषण करता है। 2026 के संस्करण की थीम संस्कार: दृढ़ता,सामंजस्य, प्रगति,अपने आप में समय की मांग का दार्शनिक उत्तर है। दृढ़ता उस क्षमता की ओर संकेत करती है जो देशों को युद्ध, महामारी, आर्थिक झटकों और तकनीकी व्यवधानों के बीच टिके रहने की शक्ति देती है।सामंजस्य बहुध्रुवीय विश्व में सह-अस्तित्व की आवश्यकता को रेखांकित करता है,जहां प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद अनिवार्य है।और प्रगति यह दर्शाती है कि तकनीकी आर्थिक और सामाजिक विकास को टाला नहीं जा सकता बल्कि उसे जिम्मेदारी के साथ दिशा देनी होगी। यह थीम केवल भाषाई अलंकरण नहीं,बल्कि वर्तमान वैश्विक उथल-पुथल के बीच नीति-निर्माताओं के लिए कार्यसूची है।इस बार 110 देशों के लगभग 2,700 प्रतिनिधि सम्मेलन में भाग ले रहे हैं मंत्री, पूर्व राष्ट्राध्यक्ष, संसद सदस्य, सैन्य कमांडर, उद्योग जगत के नेता, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ, शिक्षाविद, पत्रकार और युवा नीति-विश्लेषक। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से लाखों दर्शक इसे देख रहे हैं। यह संख्या बताती है कि नई दिल्ली आज केवल दक्षिण एशिया का राजनीतिक केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श का भी एक प्रमुख स्थल बन चुकी है। युद्धग्रस्त मध्य पूर्व की पृष्ठभूमि में यह उपस्थिति विशेष अर्थ रखती है: जब हथियार बोल रहे हों, तब संवाद के लिए इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी स्वयं में एक संदेश है। साथियों बात अगर हम इस वर्ष के प्रमुख अतिथि की बात करें तो वें हैं फिनलैंड के राष्ट्रपति, जो 5-7 मार्च तक भारत की राजकीय यात्रा पर हैं। लगातार आठ वर्षों तक विश्व के सबसे खुशहाल देशों में शीर्ष स्थान पाने वाले फिनलैंड का नेतृत्व कर रहे स्टब का मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होना कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक ओर यह भारत-फिनलैंड द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने का अवसर है; दूसरी ओर यह संकेत भी है कि यूरोप के छोटे लेकिन तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत देश भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। रक्षा, साइबर सुरक्षा, 5जी /6जी , क्वांटम तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग परविशेष जोर है। फिनलैंड की तकनीकी दक्षता और भारत का विशाल बाजार व प्रतिभा-संसाधन,दोनों मिलकर भविष्य की साझेदारी का आधार बन सकते हैंभारतीय पीएम ने ने स्टब का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया कि यह यात्रा केवल औपचारिकता नहीं,बल्कि रणनीतिक गहराई का विस्तार है।बदलते भू- राजनीतिक समीकरणों में भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को संतुलित औरविविधीकृत कर रहा है। यूक्रेन युद्ध,नाटो की विस्तारवादी बहस,और रूस- पश्चिम तनाव के बीच भारत का यूरोपीय देशों से संवाद एक स्वतंत्र विदेश नीति की पुष्टि करता हैफिनलैंड के साथ संभावित एमओयू रक्षा उत्पादन, हरित ऊर्जा, और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। साथियों बात अगर हम सम्मेलन की विषय-सूची समय की चुनौतियों को समझने की करें तो यह समय का व्यापक मानचित्र प्रस्तुत करती है। विवादित सीमाएं: शक्ति, ध्रुवीयता और परिधि सत्र उस वास्तविकता को संबोधित करता है जिसमें सीमा-विवाद केवल भूगोल का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता,संसाधनों औरसामरिक प्रभुत्व का मुद्दा बन चुके हैं। रिपेयरिंग द कॉमन्स: न्यू ग्रुप्स, न्यू गार्डियंस, न्यू एवेन्यूज वैश्विक सार्वजनिक संसाधनों समुद्र, साइबर स्पेस, जलवायु की रक्षा में नएसहयोगी ढांचे की खोज करता है। व्हाइट व्हेल: द परस्यूट ऑफ एजेंडा 2030 संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति पर प्रश्न उठाता है, विशेषकर तब जब कई देश युद्ध और ऋण- संकट से जूझ रहे हैं। द इलेवन्थ आवर: क्लाइमेट, कॉन्फ्लिक्ट एंड द कॉस्ट ऑफ डिलेजलवायु परिवर्तन और संघर्ष के अंतर्संबंधों को उजागर करता है। टुमॉरोलैंड:टुवर्ड्स ए टेक- टॉपिया और ट्रेड इन द टाइम ऑफ टैरिफ्स तकनीकी शासन, आपूर्ति शृंखला की लचीलापन और व्यापारिक संरक्षणवाद के युग में आर्थिक पुनर्रचना की चर्चा करते हैं। साथियों बात अगर हम सम्मेलन में विशेष विषयों की करें तो विशेष उल्लेखनीय है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल गवर्नेंस और सप्लाई चेन रेजिलिएंस जैसे विषय केंद्रीय एजेंडा में हैं। कोविड-19 महामारी और उसके बाद के भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि आपूर्ति शृंखलाओं का अत्यधिक केंद्रीकरण जोखिमपूर्ण है। भारत चीन-प्लस-वन रणनीति के संदर्भ में विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स का वैकल्पिक केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में रायसीना डायलॉग नीति- निर्माताओं और उद्योग जगत के लिए एक साझा मंच प्रदान करता है, जहां व्यापारिक साझेदारियां और रणनीतिक निवेश की संभावनाएं आकार लेती हैं।मध्य पूर्व के संकट के बीच अमेरिका की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर लैंडौ कर रहे हैं। यह उपस्थिति दर्शाती है कि वैश्विक संघर्षों में उलझा होने के बावजूद वॉशिंगटन नई दिल्ली के साथ संवाद को प्राथमिकता देता है भारत- अमेरिका संबंध पिछले दशक में रक्षा, तकनीक और इंडो- पैसिफिक रणनीति के संदर्भ में गहरे हुए हैं। फिर भी भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर कायम है वह अमेरिका, रूस, यूरोप और पश्चिम एशिया सभी के साथ संवाद बनाए रखता है। यही संतुलन उसे एक विश्वसनीय मध्यस्थ और स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करता है।साथियों बात अगर हमरायसीना डायलॉग क़े एक महत्वपूर्ण पहलू को समझने की करें तो वह इसका मल्टी- स्टेकहोल्डर स्वरूप है। यहां केवल सरकारें नहीं, बल्कि थिंक टैंक, उद्योग जगत, स्टार्टअप, सैन्य विश्लेषक और युवा भी भाग लेते हैं। यह संरचना 21वीं सदी की उस वास्तविकता को स्वीकार करती है जिसमें शक्ति केवल राज्यों तक सीमित नहीं रही। तकनीकी कंपनियां, डिजिटल प्लेटफॉर्म और निजी निवेशक भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित करते हैं। इसलिए सम्मेलन का विमर्श पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर समावेशी नीति-निर्माण की दिशा में जाता है।भारत के लिए यह आयोजन प्रतीकात्मक से अधिक व्यावहारिक महत्व रखता है। एक ओर यह वैश्विक मंच पर उसकी साख को मजबूत करता है; दूसरी ओर यह आर्थिक अवसरों, तकनीकी सहयोग और रक्षा साझेदारियों के द्वार खोलता है। जब दुनिया के कई हिस्सों में अस्थिरता है, तब स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और तेज आर्थिक विकास दर भारत को आकर्षक साझेदार बनाते हैं। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है,भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा-निर्माता बनने की आकांक्षा रखता है।फिनलैंड के साथ रक्षा और हाई-टेक सहयोग की चर्चा इस आकांक्षा का व्यावहारिक आयाम है। उत्तरी यूरोप का यह देश साइबर सुरक्षा,आर्टिफिशियलइंटेलिजेंस शिक्षा मॉडल और हरित प्रौद्योगिकी में अग्रणी है। भारत अपनी ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति के तहत उन्नत तकनीक और संयुक्त उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यदि दोनों देशों के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और अनुसंधान सहयोग बढ़ता है, तो यह इंडो-पैसिफिक और यूरोपीय सुरक्षा के बीच सेतु का काम कर सकता है। साथियों बात अगर हम रायसीना डायलॉग क़े व्यापक प्रभाव को समझने की करें तो इस तथ्य में भी निहित है कि यह केवल नीति-निर्माताओं का सम्मेलन नहीं, बल्कि नैरेटिव का निर्माण स्थल भी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कथ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शक्ति- संतुलन। भारत इस मंच के माध्यम से यह स्थापित करता है कि वह संघर्षों का पक्षकार नहीं, बल्कि समाधान का सहभागी है। वह वैश्विक दक्षिण की आवाज भी है और विकसित देशों का रणनीतिक भागीदार भी। यही दोहरी पहचान उसे विशिष्ट बनाती है।मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह सम्मेलन एक और संदेश देता है युद्ध अनिवार्य नहीं है, विकल्प मौजूद हैं। संवाद, सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व के माध्यम से वैश्विक चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन, साइबर खतरे, आर्थिक असमानता और आतंकवाद जैसे मुद्दे सीमाओं से परे हैं; इनका समाधान भी सीमाओं से परे सहयोग से ही संभव है। रायसीना डायलॉग इसी बहुपक्षीय सहयोग की प्रयोगशाला है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 5-7 मार्च 2026 का यह आयोजन भारत की विदेश नीति की परिपक्वता और आत्मविश्वास का प्रदर्शन है। युद्ध की पृष्ठभूमि में आयोजित यह सम्मेलन दर्शाता है कि नई दिल्ली केवल घटनाओं की प्रतिक्रियात्मक दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय एजेंडा-निर्माता है। संस्कार: दृढ़ता, सामंजस्य, प्रगति केवल सम्मेलन की थीम नहीं, बल्कि उस विश्व-दृष्टि का सार है जिसे भारत आगे बढ़ाना चाहता है-एक ऐसा विश्व जहां प्रतिस्पर्धा हो, पर टकराव नहीं; जहां विविधता हो, पर विभाजन नहीं; और जहां प्रगति हो, पर असंतुलन नहीं। यदि यह संदेश वैश्विक नीति-निर्माताओं के बीच प्रतिध्वनित होता है,तो रायसीना डायलॉग 2026 केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था में भारत की निर्णायक उपस्थिति का ऐतिहासिक अध्याय सिद्ध होगा। *-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र *