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होशियारपुर/दलजीत अज्नोहा 04 March : अगर नव निर्मित भवन में गम्भीर वास्तु दोष है तो सोने को भी पीतल बनने में समय नहीं लगता इसके विपरित भवन वास्तु के नियमों एवम सिद्धांतो पर खरा उतरता है तो पीतल से सोना बनने में समय नहीं लगता ऐसा मानना है अंतर्राष्ट्रीय वास्तु विशेषज्ञ एवम लेखक डॉ भूपेंद्र वास्तुशास्त्री का।हम जिस प्रकार के भवन में रहेगें उस भवन की उर्जा से हमारे हाव-भाव,चाल-चलन,मनोदशा ,निर्णय लेने की क्षमता,परख ओर सोच वैसी हो जायेगी जेसी भवन की वास्तु है। भवन में पंच तत्व, दिशा,द्वार ,भूमि की ढलान,रंग भूखण्ड का आकार बड़े मायने रखता है। खास कर तीन तेरह कोण का अगर भवन है तो वह बड़ा घातक हो सकता हैं, भवन का आकार वृगाकर ओर आयताकार शुभ होता है। इसलिए सबसे पहले वक्त निर्माण इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भवन के ईशान कोण को साफ सुथरा हल्का ढलाई और नीचा व दोष मुक्त रख कर हम अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त कर सकते हैं। भवन में भूमिगत जल स्त्रोत भी ईशान कोण में ही रखें। भवन के नेरित्य कोण को भारी निर्माण के साथ ऊंचा रखें। किन्ही कारणों से नेरित्य में खड्डा, बेसमेंट, बोरवेल आदि हो जाते हैं तो व्यक्ति औंधे मुंह गिर जाता है, व्यापर चौपट हो जाता है अक्समात दुर्घटना अंग भंग जन हानि आदि होने की प्रबल संभावना रहती है,अतः नेरीत्य को दोष मुक्त रख कर जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं। आग्नेय कोण में अग्नि तत्त्व को स्थान देकर के वास्तु लाभ प्राप्त कर सकते है। वायव्य कोण को किसी भी परिस्थिति में ईशान कोण से नीचा न होने दे अगर वायव्य कोण ईशान से नीचा हो गया तो व्यक्ति अपने जीवन के साथ खुद पर भी नियंत्रण न रख पाएगा।वायव्य दूषित तो अनगिनत शत्रु भी बन जाते हैं ।चारों कोणों के साथ ब्रह्म और मर्म को सुधार लिया जाता है तो आपके यहाँ पर पीतल भी सोना बनने में वक्त नहीं लगता है ।