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Ludhiana | March 1 : अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के संदर्भ में वैश्विक व्यापार पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएँ उभर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में यह आकलन किया जा रहा है कि यदि यह संघर्ष व्यापक या लंबी अवधि का होता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा भारत के निर्यात क्षेत्र पर पड़ सकता है। 1. कच्चे तेल की कीमतों पर प्रभाव खाड़ी क्षेत्र, विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य, वैश्विक तेल आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग है। किसी भी सैन्य टकराव से तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका रहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है। भारत अपनी लगभग 85% कच्चे तेल की आवश्यकता आयात से पूरी करता है। तेल कीमतों में वृद्धि से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे रसायन, पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक, वस्त्र एवं इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों पर दबाव पड़ सकता है। 2. शिपिंग और लॉजिस्टिक्स चुनौतियाँ यदि संघर्ष फारस की खाड़ी, लाल सागर या स्वेज नहर क्षेत्र तक फैलता है, तो समुद्री परिवहन महंगा और समय-साध्य हो सकता है। बीमा प्रीमियम और मालभाड़ा दरों में वृद्धि से यूरोप, अमेरिका और मध्य-पूर्व को होने वाले निर्यात पर असर पड़ सकता है। विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) निर्यातकों के लिए लागत वृद्धि एक बड़ी चुनौती बन सकती है। 3. मुद्रा विनिमय दर पर प्रभाव भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौरान अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में उतार-चढ़ाव आता है। रुपये में संभावित गिरावट से निर्यात प्रतिस्पर्धा को कुछ लाभ मिल सकता है, किंतु आयातित कच्चे माल और तेल की बढ़ी हुई लागत इसका संतुलन बिगाड़ सकती है। 4. क्षेत्रवार प्रभाव फार्मा एवं आईटी सेवाएँ: अपेक्षाकृत स्थिर रहने की संभावना। इंजीनियरिंग एवं ऑटो कंपोनेंट्स: लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से प्रभावित हो सकते हैं। रसायन एवं पेट्रोकेमिकल: तेल कीमतों पर अत्यधिक निर्भर। कृषि एवं खाद्य उत्पाद: वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान की स्थिति में अवसर भी मिल सकते हैं। 5. समग्र परिदृश्य यदि संघर्ष सीमित और अल्पकालिक रहता है, तो भारत के निर्यात पर प्रभाव अस्थायी और नियंत्रित रहने की संभावना है। किंतु यदि स्थिति लंबी अवधि तक बनी रहती है और तेल कीमतों व समुद्री मार्गों पर गंभीर असर पड़ता है, तो निर्यात वृद्धि दर में मध्यम गिरावट संभव है। भारत की विविधीकृत निर्यात संरचना, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और विस्तृत व्यापार साझेदारियाँ इस प्रकार के बाहरी झटकों से निपटने में सहायक सिद्ध होंगी। सरकार और उद्योग जगत स्थिति पर सतत निगरानी रखे हुए हैं ताकि व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला की निरंतरता सुनिश्चित की जा सके।