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अजीत झा. चंडीगढ़ 23 Feb : चंडीगढ़ स्थित कर्ज वसूली अधिकरणों (डीआरटी) में पीठासीन अधिकारियों की लगातार खाली पदों को लेकर पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा लागू स्थगन आदेश के चलते वह इस मामले में ठोस निर्देश पारित नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ की तीनों डीआरटी में नियुक्तियों की वर्तमान स्थिति पर स्पष्टता मांगी। दो अधिकरण बिना नियमित अध्यक्ष, तीसरे का कार्यकाल समाप्ति पर अदालत को बताया गया कि चंडीगढ़ की तीन डीआरटी में से दो पहले से ही नियमित पीठासीन अधिकारियों के बिना काम कर रही हैं, जबकि तीसरे अधिकारी का कार्यकाल मार्च में समाप्त होने वाला है। यह स्थिति न केवल न्यायिक व्यवस्था बल्कि बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है। चंडीगढ़ की डीआरटी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और केंद्र शासित चंडीगढ़ के मामलों की सुनवाई करती हैं। नियुक्तियां एसीसी के समक्ष लंबित केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने अदालत को बताया कि नियुक्तियों का मामला केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) के समक्ष लंबित है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि मौजूदा व्यवस्था केवल अस्थायी समाधान है और स्थायी नियुक्तियों की आवश्यकता है। अदालत ने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट की रोक के कारण वह सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। प्रतिदिन 70–100 मामलों की सूची याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि डीआरटी में प्रतिदिन 70 से 100 मामलों की सूची लगती है, जिनमें 30 से 40 अत्यावश्यक प्रकृति के होते हैं। यदि अधिकरण निष्क्रिय हो जाते हैं तो सैकड़ों याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर होंगी, जिससे न्यायिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। देशभर में 2.48 लाख से अधिक मामले लंबित देश में कुल 39 डीआरटी कार्यरत हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक इन अधिकरणों में 2,48,458 मामले लंबित थे, जिनमें लगभग 16.13 लाख करोड़ रुपये की राशि दांव पर है। फरवरी–मार्च 2026 तक करीब 20 डीआरटी में पीठासीन अधिकारियों का चार वर्षीय कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है, जिससे कई अधिकरण निष्क्रिय होने की कगार पर हैं। चंडीगढ़ डीआरटी-द्वितीय, जो फिलहाल बिना स्थायी पीठासीन अधिकारी के कार्य कर रहा है, लंबित मामलों के आधार पर देश के शीर्ष 10 अधिकरणों में शामिल है। ये शीर्ष 10 डीआरटी कुल लंबित मामलों के 43.6 प्रतिशत और कुल लंबित राशि के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। असर: बैंक, उधारकर्ता और न्याय व्यवस्था प्रभावित यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं या कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया तो क्षेत्र पूरी तरह कार्यशील डीआरटी से वंचित हो सकता है। इसका सीधा प्रभाव बैंकों, वित्तीय संस्थानों, उधारकर्ताओं और न्याय प्रणाली पर पड़ेगा।हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी है।